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Tuesday, 3 October 2017

गाँधी जयन्ती पर विशेष....जानें कौन थे गाँधी ?

हम आप मे से कुछ युवा आज गाँधी जी के और उनके विचारों के धुर विरोधी हैं अगर वजह पूछा जाए तो कुछ युवा पाकिस्तान बंटवारे का हवाला देते हैं तो कुछ शहिद-ए- आज़म भगत सिंह का मुकदमा जानबूझकर न लड़ने का और कुछ युवाओ से पूछो तो उनको तो वजह पता ही नही बस शौकिया नेतागिरी में विरोध करते हैं क्योंकि आज की मानसिकता बन चुकी है कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को गालियां दो और फेमस हो जाओ। जबकि आज के युवाओं की मानसिकता ऐसी है कि पढ़ाई के बाद कोई डॉक्टर , इंजीनियर, वैज्ञानिक, बैरिस्टर, आई ए एस, पी सी एस इत्यादि नही बनना चाहता आज की तारीख में देश के हर विश्वविद्यालय का सर्वे किया जाए तो पता चले की देश का  90% युवा पढ़ाई के बाद नेता बनने का इच्छुक है। उससे भी भयंकर विचार ये है कि वो देश सेवा की भावना से नही बल्कि इसलिए नेता बनना चाहता है क्योंकि वो आज कल हो रहे भ्रष्टाचार को देखकर बेहद लालायित है कि हम भी जल्द से जल्द नेता बनकर ये सब ऐश्वर्य हांसिल कर सके। उसके लिए युवा अपने क्षेत्र के किसी न किसी बड़े नेता के घर के बाहर दिन रात पहरेदार बनकर बैठा रहता है नेता जी जैसे ही घर के बाहर निकले उनके पीछे पीछे लग जाओ और नेता जी का खास चाटुकार बनकर शायद दलाली का कुछ पैसा मिल जाये जिससे 2-4 दिन के गाड़ी के पेट्रोल और डीज़ल का पैसा निकल सके और नेता जी की सेवा में समर्पित रह सके जिससे वो नेता जी के और उत्तम श्रेणी के चाटुकार बन सके।

नेता जी की सेवा से जो समय बचत है वो प्रापर्टी डीलिंग में लगाते हैं जिससे मेंटेन रहने के लिए आखिर धन कहा से आये। क्योंकि घर पर माँ बाप की सेवा परिवार की समस्याओं से बहुत दूर हैं तो घर से आर्थिक सहायता मिलने से रही उनके माँ बाप बंधु सखा सब नेता जी ही हैं। ऐसे में बेईमानी ही जिनके जीवन का लक्ष्य मात्र हो उनसे गांधी जी के विचारों पर सहमति अथवा उनको आदर्श को जीवन उतारने व उनके सामने सत्य अहिंसा का भाषण देना उस महापुरुष का अपमान होगा।


कुछ पढ़े लिखे बैद्धिक युवा मित्र भी गांधी जी का विरोध करते हैं ऐसे में यही कहना उचित होगा कि आप सभी बंधु गांधी जी के बारे में अपनी भ्रांतियों को उनके बारे में और अध्ययन करके जरूर दूर करें। आज के इस जीवन के परिवेश में हम चाहे जितना भी धन संचय कर ले लेकिन अपने बच्चो को इस अच्छे विद्यालय में पढाने में समझ मे आ जाता है और उस समय मे गांधी जी अपनी शिक्षा पूर्ण करने (1888-91, बैरिस्टर की पढाई, लंदन युनिवर्सिटी) विदेश गए थे जिससे स्पष्ट है की गांधी जी एक सम्पन्न परिवार से थे फिर भी अपने जीवन पर्यंत गांधी जी ने देश की गरीबी को देखते हुए तन ढकने के लिए सदैव एक ही वस्त्र का उपयोग किया। इंग्लैंड में अध्ययन करते समय गांधी जी ने सर एडविन अर्नाल्ड द्वारा अनुदित  गीता पढ़ी. इसने उनके दृष्टिकोण को सर्वाधिक प्रभवित किया तथा उन्हें कर्म योगी बनाया। वे गीता को अपना पथ प्रदर्शक तथा आध्यात्मिक निर्देश ग्रंथ मानते थे। गांधी जी ने सत्य व अहिंसा के नैतिक सिद्धांतों तथा आदर्शों के बारे में गीता से बहुत कुछ सीखा इसके अतिरिक्त गांधीजी ने उपनिषद्, पतंजलि के योग सूत्र, रामायण, महाभारत, जैन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तकों का भी अध्ययन किया था। इन पुस्तकों के अध्ययन से सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह में उनकी आस्था बहुत दृढ़ हो गई थी। अहिंसक प्रतिरोध की शिक्षा उन्हें ईसा मसीह के इन शब्दों से मिली

“भगवान उन्हें क्षमा कीजिए। क्योंकि वे नहीं जानते की वे क्या कर रहे हैं।"


गांधी जी ने जब अपनी क़ानून की पढ़ाई ख़त्म कर इंग्लैंड में वकालत शुरू की तो वह पूरी तरह असफल साबित हुए। दक्षिण अफ्रीका में वह बहुत सफल वकील बने और उनकी आमदनी दक्षिण अफ्रीका में 15000 डॉलर सालाना तक हो गई थी। जरा सोचिये, 99% भारतीयों की सालाना आय आज भी इससे कम है फिर भी अफ्रीका छोड़ कर गांधी जी भारत की दीन दशा देखकर भारत वापस आये अनेको आंदोलनों की शुरुआत की और बिना सस्त्र उठाये अंग्रेजो से अपनी अनेकानेक मांगे मनवाई। आज के परिवेश में हम अपने आप से सवाल करें कि हम आप में से कितने देशभक्त है जो अपनी इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर देश के लिए महात्मा की तरह जीवन गुजरने को तैयार हैं ??



भारत की स्वंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ पत्रकार गाँधी जी के पास आए और उनसे अंग्रेजी में बात करने लगे. मगर गाँधी जी ने सभी को रोका और कहा कि, “मेरा देश अब आजाद हो गया है, अब मैं हमारी हिन्दी भाषा ही बोलूँगा। आज हम में से कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग देश आजाद होने के बावजूद हिंदी भाषा को बोलने वाले को हीन भावना से देखते हैं और हिंदी को गवारो की भाषा की श्रेणी में रखे हुए है।
गांधी जी भारत ही नही अपितु पूरे विश्व के लिए सम्पूर्ण मानव जाति के लिए एक महान दार्शनिक और प्रेरणाश्रोत हैं। इसी सापेक्ष में 15 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस स्थापित करने के लिए मतदान हुआ।महासभा में सभी सदस्यों ने 2 अक्टूबर को इस रूप में स्वीकार किया जो को भारत के लिए और हम सभी के लिए बड़े ही गर्व का विषय हैं।
उस महापुरुष के बारे में कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है।
अहिंसा अपनाने से आपसी सौहार्द बढ़ता हैं भारतीय राजव्यवस्था यहां तक कि भारतीय न्यायपालिका में भी गांधी विचारधारा से ओतप्रोत होकर मिडिएशन सेन्टर खोला गया है जहाँ मुकदमो का निस्तारण बातचीत के माध्यम से हल करवाया जाता है। अहिंसात्मक न होने से मानवजाति का नुकसान ही होता है आपसी रंजिश बढ़ती है मानवता को भी कभी कभी शर्मिंदा होना पड़ता हैं। अगर हम गांधी जी का अनुकरण न करके अपने धर्मो का ही सही मायने में अनुकरण करें तो कोई भी धर्म हमें हिंसा करना तो नही सिखाता।
आइये हम सभी संकल्प करें कि उस महामानव जो पूरे विश्व को सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ा गया पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने की पुरजोर कोशिश की उस महात्मा के बताए मार्गों का आत्मसात करके हम जहां भी है अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करके उनको सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे व देश के यसस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी के आह्वाहन स्वच्छ भारत अभियान के तहत बाहरी गंदगी के साथ अपनी आत्मिक गंदगी को भी दूर करेंगे।


लेखक-: भागवत शुक्ल जी वर्तमान में लखनऊ हाइकोर्ट में कार्यरत है
साभार-: फेसबुक वाल से 

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