बच्चों का शक्तिमान वाला दूरदर्शन - शब्दबाण

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Friday, 22 September 2017

बच्चों का शक्तिमान वाला दूरदर्शन



बच्चों का शक्तिमान वाला दूरदर्शन

हमें हर्ष हो रहा है कि मेरा जन्म दूरदर्शन युग में हुआ है। दूरदर्शन का इतिहास काफ़ी पुराना है, १५ सितम्बर १९५९ को प्रयोगात्मक रुप में इसकी शुरुआत हुयी थी। किन्तु १९७५ में दूरदर्शन का नयें रुप‌ में उदभव हुआ। दूरदर्शन लोकप्रियता का प्रयाय ही नहीं बना अपितु सकारात्मक की ज्योती को प्रदिप्त किया। दूरदर्शन ने लोगों को लोकमंगल से लोकरंजन और लोकमंगल से मनोरंजन की सभी बुनियादी तथ्य उपलब्ध करवाए। दूरदर्शन सड़क से लेकर संसद तक अपनी आवाज़ बुलंद करता आ रहा है। चाहें खेती-किसानी की समस्या हो, ग्रामीण समस्याएं हो या मूलभूत समस्याएं सभी को दूरदर्शन ने सहेजने का अनुपम कार्य किया है। 


 जीवन के 20 बसंत दूरदर्शन देखते हुए निकल गये, किन्तु कभी अहसास ही नहीं हुआ कि हम धीरे-धीरे अपने प्रिय चैनल से बहुत दूर होते जा रहें है।

भूमंडलीय करण के उपरान्त टी.वी. चैनलों की सत्ता निजी लोगों‌ के हाथों में आ गयी, चैनलों का निजीकरण होता चला गया और हम धीरे-धीरे अपने प्रिय चैनल से बहुत दूर निकल गये। जैसे आसमान में कोई तारा टूट कर बिखर गया हो उसकी टिमटिमहट का रंग फ़ीका हो गया हो।

दुरदर्शन से लगाव सहज ही नहीं है, बहुतों का जन्म ही दूरदर्शन देखते हुए हुआ है, माँ कोख़ में लिए अपने बच्चों को जब दूरदर्शन पर महाभारत देखते होगी तब बच्चा भी अभिमन्यु की भांति चक्रव्यूह भेदन के गुण- धर्म को समझ कर मंद-मंद मुस्करा रहा होगा।

हमारा चित्रहार और शक्तिमान वाला दूरदर्शन आज़ स्वयं‌ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है, किन्तु आज़ निजीकरण के दौर में सभी प्राइवेट चैनलों ने इस चौथे स्तम्भ को अंदर से खोखला कर दिया है। मीडिया आज आज़ पत्रकारिता के मिशन से कोशों दूर बड़े ओहदेदारों की जूती चाटने में‌ लगा है। जिसका एकमात्र लक्ष्य अपना व्यसाय बढ़ाकर समाज को रंगहीन-गंधहीन पारदर्शी द्रव्य के समान बनाना है जिसका कोई अस्तित्व ही न रह जाये।

 मीडिया
का उद्देश्य आज़ बिना किसी राजनैतिक विद्धेष या व्यक्तिगत कारणों को छोड़कर सरकारी नीतियों को प्रसारित करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए जिससे हम समाज़ को विकास की मुख्यधारा में ला सके।

 किन्तु हर्ष इस बात का है कि इन सब में दूरदर्शन आज़ भी अपने कर्तव्य पथ पर गतिशील है, सटीक विश्लेषण, खेती-किसानी की समस्याओं का निदान वास्तविक पत्रकारिता का स्वरुप आज़ सिर्फ़  दूरदर्शन में दिखायी देता है। 
चैनलों की कार्यप्रणाली को देखकर चारित्रिक पतन को देखते हुए समाज़ आज़ पुनः दूरदर्शन की ओर आशा भरी निगाह से देख रहा है। अवश्यकता है तो सिर्फ अच्छे इंफ्रास्ट्रेक्चर एवं समाजिक दायरे को बढ़ाकर गुणवत्ता में सुधार करने का

देश में यू तो चैनल अनेक है, किन्तु दूरदर्शन सिर्फ़ एक है।


जय हिन्द- वंदेमातरम्


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