छोटू को मुस्करानें दो बच्चों को बच्चा ही रहनें दो (say no to child labour in Hindi) - शब्दबाण

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Saturday, 17 June 2017

छोटू को मुस्करानें दो बच्चों को बच्चा ही रहनें दो (say no to child labour in Hindi)



रोज़ सुबह जूठे बर्तन उठाता है छोटू
होटलों पर साहब को कटिंग चाय पिलाता है छोटू
फ़िर भी अपने हाल पर हर वक्त मुस्कराता है छोटू
मैम साहब के बच्चे को बहलाता है छोटू
उन्हे नहला कर स्कूल ले जाता है छोटू
अपनी तकदीर पर फ़िर भी मुस्कराता है छोटू
छोटी-छोटी गलतियों पर साहब से मार खाता है छोटू
फ़िर भी अपनी बेवशी पर मुस्कराता है छोटू
बाजारों मे गुब्बारों को देख खिलखिलाता है छोटू
अपनी जेब में हाथ डाल कर फ़टी जेब पर मायूस हो जाता है छोटू
चाहे धूँप हो चाहे छाँव हो हर दिन ड्यूटी बजाता है छोटू
मुँह में चाहे न निवाले हो पैरों‌ में चाहे छाले हो फ़िर भी काम पर आता है छोटू।।
           Say no to child labour in hindi

यही कुछ दर्द विदारक पंक्तियाँ है, जो हमें लिखने के लिए वेवश कर देती है। बात जब दर्द और अहसास की हो तो कलम और शब्दकोश में संधर्ष होना निश्चित है। ऐसे संधर्ष को चरणबद्ध करने के लिए कलम को भी काफ़ी संधर्ष करना पड़ता है। अहसास कलमों से बयां होने वाली विषयवस्तु नहीं है,अपितु अनतःकरण को झकझोर देने वाली समरेकित अवधारणा है, यह कोई पंक्तियाँ नहीं है न ही किसी कवि के कलाकारी का अनुपम उदाहरण है, यह सत्य है अकाट्य सत्य जो नित्य हमारें समाज मे धटित हो रही है। कहते है युवा देश का भविष्य है, हमारे देश की अर्थव्यवस्था युवाओं‌ के कंधों पर टिकी है लेकिन वो कौन से युवा है जो स्वयं रेलवे स्टेशनों पर बस अड्डों पर हाथ फैलाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है या वह युवा है जो होटलों में फ़ैक्ट्रियों में स्वयं के भविष्य को बचाने के लिए संधर्ष कर रहे है।

राष्ट्र को दीपों की माला से प्रज्जवलित करने वाला "असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय" की परिकल्पना से कोशो दूर एक परिवार का नन्हा दीपक स्वयं अपने धर को हर तमस से बचाने के लिए संधर्ष कर रहा है, वह नन्हा दीपक अपने धर को नहीं तमस से बचा पा रहा है, तो राष्ट्र को क्या खाक प्रज्जवलित करेगा।

रोज़ सुबह ऐसे हजारों छोटूओं को जूठे बर्तन उठाते धुलते देखा है, साहब के लिए कटिंग चाय की प्याली लेकर बड़ी तन्मयता से मुस्कुराता है मानों उसका संसार यही तक सीमित है। उस गरीब का दर्द कौन समझेगा जिसकी साँसे भी गुब्बारों‌ में बिक जाती है, रेलवे स्टेशनों पर बस अड्डों पर देश का दीपक हाथ फ़ैलाये बुझने से बचने के लिए संधर्ष करता हुआ दिख जाता है।
    Say no to child labour in hindi

लेकिन बिड़म्बना देखो अमीरों के छत कितने छोटे और गरीबों‌ का आशियाना कितना बड़ा है पूरा खुला आसमान है जहाँ से हर रोज़ असंख्य तारों को गिनकर अपनी राते बिताता है। सपने देखता है कि इन्ही तारों की तरह वह भी एक दिन राष्ट्र के मानस पर टिमटिमायेगा। गर्मी हो या सर्दी धूप हो या छाँव, ठुरठुराती सर्दी में भी स्ट्रीट लाइटों‌ के प्रकाश में अपने भविब्य की आस लगाये एक नये नूतन उजाले की आशा लेकर बैठा रहता है, शायद उसके जीवन में भी नये दिन की तरह उजाला भर जाये किन्तु यह मात्र कोरी कल्पना है क्योकि छोटू तो आख़िर छोटू है।




पेट भी कितना निर्मम है जिसे भरने के लिए ननिहालों‌ को भीख़ माँगना पड़ता है, हरिद्धार प्रवास के दौरान एक ऐसे ही छोटू से हमारी मुलाकात हो गयी, मैनें उसको पास बुलाया और पूछा बेटा स्कूल क्यो नहीं‌ जाते उसका जवाब था पैसे नहीं है मैनें कहा भीँख माँगने को कौन भेजता है माँ-बाँप वह एकटक हमारी तरफ़ देखने लगा और अनायाश ही उसके आँखो से आश्रृधारा निकल आयी बोला पिता जी नहीं है माँ बीमार रहती है भीख माँगकर जो पैसे मिलते है उससे उन्की दवा लेते है और कुछ खाने को ले जाते है। मैने पूछा पढ़ने का मन है वह बोला हाँ दो में पढ़ता था छोड़ दिया पैसे ही नहीं है, वह बच्चा तो चला गया किन्तु हमारा हद्धय विकीर्ण हो गया अनेकों प्रशनचिन्ह छोड़ गया जो आज भी अनसुलझे रहस्य की तरह मस्तिष्क में टकराहट पैदा करते रहते है। पता नहीं मेरा संधर्ष समाज से है सरकार से या स्वयं अपने आप से।

12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के रुप में मनाया गया अनेकों‌ कार्यक्रम हुए संगोष्ठियाँ हुयी बडे-बड़े विचारकों‌ द्वारा चिंतन मनन किया गया किन्तु यह सिर्फ औपचारिकता मात्र है धरातल से इनका कोई जुड़ाव नहीं है। धड़ियाली आँसू बहाने वाले समाज के वही लोग है जिनके धरों में फ़ैक्ट्रियों मे फार्म हाऊसों में‌ कार्य करने वाले वही नन्हे दीपक है ननिहाल है।
        Say no to child labour in hindi

सरकार ने बाल श्रम‌ को रोकने के लिए अनेकों‌ कानून बनाये है, किन्तु उनका पालन कही नहीं हो रहा है आज़ भी फ़ैक्ट्रियों में १४ वर्ष से कम‌ उम्र के बच्चो को बोझा ढ़ोते हुए देखा जा सकता है। सरकारी नितियाँ सिर्फ़ कागजो तक सीमित है इन्का कितना क्रियन्वय हो रहा है पूरे समाज को स्पष्ट दिखायी दे रहा है। इसका जिम्मेदार प्रशसनिक अमला ही नहीं है न ही सरकार है अपितु समाज के अन्तिम पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति भी है जो देश के ननिहाल रुपी ईटों‌ का सही संयोजन न करके देश को गर्त में ले जाने की धारणा को विकसित करने कार्य सृजित कर रहा है।




मंजिले और भी हैं!
कैलाश सत्यार्थी




मंजिले और भी है में आज आपको मिलवाते है ऐसे महान शख्सियत से जिन्होने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया बाल श्रम से विश्च को मुक्त कराने के लिए



2014 में नोबेल के शान्ति पुरस्कार विजेता भारतीय बाल आधिकार कार्यकर्ता और बाल श्रम के विरुद्ध पक्षधर है जिन्हे पकिस्तान की नारी शिक्षा कार्यकर्ती मलाला युसुफ़ज़ई के साथ संयुक्त रुप से नोबेल शान्ति पुरस्कार से अलंकृत किया ऐसे महान शख्सियत का नाम लेना बड़ा चुनौतीपूर्ण हो रहा है मैं बात कर रहा हूँ कैलाश सत्यार्थी की। जिन्होने १९९० में बचपन बचाओं आन्दोलन की बिगुल बजायी जिसके अंर्तगत १४४ देशों के लगभग ८३००० बच्चों को मुक्त कराया जा चुका है। उनके अथक प्रयास एवं कार्यों के कारण १९९९ में अंर्तराष्ट्रीय श्रम संघ द्वारा बाल श्रम की निकृष्टम श्रेणियों पर संधि संख्या १८२ अंगीकृत किया गया। कैलाश सत्यार्थी जी ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ट लेबर (global march against child labour) के अध्यक्ष (president) भी है। उन्होंने अपनी आवाज़ को जन-जन तक पहुचाँने के लिए संधर्ष जारी रहेगा नामक पत्रिका का शुरुआत की। स्वामी अग्निवेश जी के साथ मिलकर बंधुआ मुक्ति मोर्चा का गठन किया जिसकें आज़ २० हजार सदस्य है, जो कालीन, काँच, ईट के भठ्ठों, फै़क्ट्रियो में कार्य करने वाले बच्चो को‌ मुक्त करता है। आज़ हमारे समाज़ को ऐसे ही शख्सियत की अवश्यकता है जो युगों-युगों में विरले ही होते है। आज से मिलकर आओं संकल्प लेते है ज़्यादा नहीं सिर्फ समाज के एक ईट के क्रम का संयोजन करेंगे। हम समाज को में परिवर्तन नहीं‌ ला सकते है किन्तु अपने स्तर से शुरुआत तो कर ही सकते है।



हम बदलेंगे-युग बदलेगा


मंजिले और भी हैं!
जितेन्द्र चतुवर्वेदी




मंजिले और भी है में ऐसी ही एक और शख्सियत से मिलवाता हूँ मैं बात कर रहा हूँ जितेन्द्र चतुर्वेदी जी की अनेकों राष्ट्रीय, अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से अलकृत एवं बाल श्रम के ख़िलाफ अनेकों‌आन्दोलन चलाने वाले शख्सियत के बारे में है जो बाल-विकास एवं स्वास्थय संवर्धन के पक्षधर है जितेन्द्र चतुर्वेदी जी राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) बिट्स पीलानी के मेंटर (Menter) एवं देहात संस्था के संस्थापक है। 

देहात संस्था द्वारा रुपैड़ीहा में हस्ताक्षर अभियान





देहात संस्था ने बाल श्रम के विरुद्ध १२ जून को नेपाल-भारत सीमा पर स्थित रुपैड़ीहा में बाल श्रम विरोध दिवस के रुप में हस्ताक्षर अभियान चलाया। बाल प्रहरी परियोजना के अंतर्गत बाल संसदीय मासिक बैठक कर उन बच्चों के दिये में उजाला करने का कार्य किया है जिनका नाम विधालयों में दर्ज था किन्तु कभी विधालयों की दहलीज पर पग नहीं रखे थे। तथा चाइल्ड़ लेवर के अगेन्सट (Against child labour) नेपाल-भारत सीमा स्थित रुपैड़ीहा में बाल मित्र केन्द्र की स्थापना की। मैं श्रीमान जी से व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिला हूँ किन्तु थोड़ी जान पहचान अवश्य हुयी थी। ऐसे महान व्यक्तित्व को हद्धय के न्यून्तम बिन्दु से नमन् आपके पगचिन्हों पर चलने के लिए कृतज्ञ हूँ।
आओं सभी मिलकर समाज में परिवर्तन लाने का संकल्प धारण करते है-हम बदलेंगे, युग बदलेगा।। मैंने व्यक्तिगत तौर पर यह जानकारी एकत्र नहीं की है श्रीमान् जी के फ़ेसबुक वाल से साभार। (Facebook wall)

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