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Friday, 23 June 2017

एक आधिकारी ऐसा भी जिससे ख़ौफ खाता था पाकिस्तान!



कुलभूषण जाधव के साथ पाकिस्तान ने जो कुछ किया है उसके बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि हम उसे उसकी ही भाषा में जवाब क्यों नहीं देते हैं? बहुत कम लोग इस सच से परिचित है कि इस देश में एक ऐसा अधिकारी था जिसने उसे उसकी समझ में आने वाली भाषा में ही जवाब दिया था और वह अंदर तक हिल उठा था। अगर उस अधिकारी की बात मान ली गई होती तो पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांत बांग्लादेश की तरह ही अलग देश बन गए होते। मगर उसकी सलाह की अनदेखी की गई।

इस अफसर का नाम गिरीश चंद्र सक्सेना था जिन्हें गैरी के नाम से जाना जाता था। वे रिसर्च एंड एनलिसिस विंग रॉ के प्रमुख रहे। उनके ही कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और जम्मू कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने वहां के प्रथकतावादियों से निपटने में बहुत होशियारी से काम लिया। हाल ही में लंबी बीमारी के बाद 90 साल की आयु में उनका निधन हुआ।

जब देश आजाद हुआ तो इंटेलीजेंस जुटाने की जिम्मेदारी इंटलीजेंस ब्यूरो की होती थी। उसकी एक घरेलू व दूसरी विदेशी विंग हुआ करती थी मगर 1962 के चीन के साथ युद्ध में तथा 1965 के पाक युद्ध में खुफिया जानकारी हासिल करने की विफलता उभर कर सामने आई। इंदिरा गांधी चाहती थी कि अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआईए की तर्ज पर हम भी ऐसी एजेंसी तैयार करे जो देश के बाहर भी भारत के हितो का ध्यान रख सके।


उन्होंने इसके लिए रिसर्च एंड एनलिसिस विंग बनाने का फैसला किया व इंटेलिजेंस ब्यूरो के बहु-चर्चित रामेश्वर नाथ काव की अध्यक्षता में इस एजेंसी का गठन हुआ। 21 सितंबर 1968 में मात्र दो करोड़ रुपए के बजट व आईबी से लाए गए 250 अफसरो, कर्मचारियो के स्टाफ से इस एजेंसी ने अपना काम-काज शुरू किया। अगले ही साल गिरिश चंद्र सक्सेना भी रॉ में आ गए। रॉ के जिन अधिकारियों ने बांग्लादेश की आजादी के लिए रणनीति बनाई। उनमें से एक प्रमुख अधिकारी गैरी सक्सेना भी थे। इन लोगों ने वहां के बारे में खुफिया जानकारियां उपलब्ध कराई व सेना ने मुक्ति वाहिनी को प्रशक्षित कर सेना, नौसेना व वायुसेना के सफल ऑपरेशन कर पाने में मदद की।

बांग्लादेश बनवाने के बाद 1975 में बहुत ही सफलतापूर्वक सिक्किम को भारत का 22वां राज्य बनवाने में रॉ ने अहम भूमिका अदा की। वहां के शासक चोग्याल का झुकाव चीन की और बढ़ रहा था। चीन उसे अपने साथ मिलाना चाहता था मगर इसके पहले ही भारत ने कार्रवाई कर दी। रॉ ने विदेशों में भी अपनी गतिविधियां बढ़ाई। इस बीच केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई रॉ के काफी खिलाफ थे। उनको लगता था कि यह एजेंसी इंदिरा गांधी के लिए काम करती थी और वे उसका इस्तेमाल अपने विरोधियों को निपटाने के लिए कर रही थी।

मालूम हो कि कैबिनेट सचिवालय के तहत आने वाली रॉ सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती थी। उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं हुआ करते थे। रॉ के प्रमुख को सेक्रेटरी (रिसर्च) नाम से जाना जाता था। जनता सरकार ने यह पद बदल कर डायरेक्टर कर दिया जोकि 1986 तक बना रहा। रॉ का असली कार्यक्षेत्र तब पाकिस्तान हुआ करता था। वह यह पता लगा रही थी कि क्या पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम चल रहा है? रॉ ने काठुआ स्थित परमाणु प्रयोगशाला के आसपास जो अपने जासूस नियुक्त किए थे उन्होंने वहां काम करने वाले कर्मचारियों और अफसरों पर नजर रखी। जब वे लोग अपने बाल कटवाने जाते तो ये लोग नाई की दुकान से बाल एकत्र करके भारत भेजते। जहां जांच में उनके बालों में रेडियो सक्रियता के संकेत मिले।

समय रहते भारत उस प्रयोगशाला को नष्ट कर सकता था। मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की एक भूल (बेवकूफी) ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेरने के साथ ही बड़ी तादाद में भारतीय एजेंटों को मरवा दिया। एक बार प्रधानमंत्री जुल्फीफार अली भुट्टो से बातचीत में उन्होंने कहा कि हमे सब पता है कि काठुआ में क्या हो रहा है। कहते है इसके बाद पाकिस्तान सावधान हो गया। वहां की सुरक्षा बढ़ा दी गई व करीब 150 भारतीय एजेंटो को मार दिया गया।

गैरी सक्सेना 1983 में रॉ के प्रमुख बने व 1986 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल के दौरान ही ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल को बहुत अहम जिम्मेदारी सौपी। वे पाकिस्तानी एजेंट बनकर स्वर्ण मंदिर परिसर में रहने लगे और वहां से तमाम अहम सूचनाएं रॉ को देने लगे।

गैरी सक्सेना के कार्यकाल में रॉ ने बड़ी तादाद में आईएसआई के एजेंटो को तोड़कर उन्हें डबल एजेंट बनाया और पाकिस्तानन को उसकी ही भाषा में जवाब देने के लिए बलूचिस्तान व सिंध में आंदोलन खड़े किए। मोहाजिर कौमी मूवमेंट खड़ा करने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही। वे चाहते थे कि सिंध को भी बांग्लादेश की तरह पाकिस्तान से अलग कर दिया जाए। मगर इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं थी। सीआईए से जुड़ी फैडरेशन ऑफ अमेरिकन साईटिस्ट नामक संस्था के मुताबिक 1983 में पाकिस्तान के अंदर 35000 रॉ के एजेंट काम कर रहे थे। इनमें से 12000 सिंध में 5000 ब्लूचिस्तान में थे। एमक्यूएम के नेता अलताफ हुसैन को पनपाने में उनकी अहम भूमिका रही। वहां रॉ ने उन्हीं कारनामों को अंजाम दिया जो कि आईएसआई भारत में देती आई थी। उन्होंने पाकिस्तान व खालिस्तान आतंकवादियों से निपटने के लिए रॉ के अंदर दो खास प्रकोष्ठ बनाए जिन्हें कि सीआईटी (एम्स) काउंटर इंटेलिजेंस पाकिस्तान व सीआईटी (जे) काउंटर इंटेलिजेस खालिस्तान के नाम से जाना जाता था। पीवी नरसिंहराव के वक्त ये काम काफी बढा। जब इंदर कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने और सीमा पर मोमबत्तियां जलाने का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने पाक से संबंध बेहतर बनाने के लिए इन दोनों ही प्रकोष्ठो को बंद करवा दिया।

यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था। रॉ की सारी मेहनत बर्बाद हो गई और उसने वहां जो अपना विशेष तंत्र तैयार किया था वह बेकार हो गया। रॉ ने कुछ खास कार्रवाईयों को अंजाम देने के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट सनरे के तहत विशिष्ट कमांडों टुकड़ी तैयार की जिसे स्पेशल ग्रुप के नाम से जाना जाता था। इसमें सेना के 250 चुनिंदा कमांड़ों को रखा गया था। जो अमेरिकी सील की तरह किसी भी देश की सीमा में घुसकर कहीं भी कोई कार्रवाई कर सकते थे।

इस मामले में ध्यान रहे कि जब इंदिरा गांधी की हत्या हो गई तो यह सवाल पैदा हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सुरक्षा का काम कौन करेगा? सेना यह काम कर नही सकती थी व तब एनएसजी का गठन नहीं हुआ था। उस समय उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी एसजी को सौंपी गई। इसके दाढ़ी वाले कमांडों अपनी काली पोशाक में काफी डरावने लगते थे। वे हमेशा चुप रहते थे। आपस में भी कोई बात नहीं करते थे। उनकी आंखें सामने वाले को भेदती हुई लगती थी। वे 1986 तक एसपीजी का गठन होने तक उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाले रहे।

गैरी सक्सेना ने राजीव गांधी के सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभाई थी। वे दो बार जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए। पहली बार उन्हें 1990 में जगमोहन को हटाकर भेजा गया। जब मीरवाइज की हत्या के बाद वहां काफी खून-खराबा हुआ था व दोबारा वे 2 मई 1998 से 4 जून 2003 तक राज्यपाल बनाए गए। उस दौरान कांधार कांड हो गया और विमान अपहरणकर्ताओं ने तीन कुख्यात आतंकवादियों की रिहाई की मांग की जिनमें से दो कश्मीर की जेल में बंद थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने अजीत डोभाल से साफ मना कर दिया।

कहते है कि डोभाल ने राजभवन जाकर सारी बात गैरी सक्सेना को बताई। उन्होंने मुख्यमंत्री को बुलवाया। उनके आने के पहले ब्लैक लेबल स्काच और दो गिलास मंगवाए। फारूक को दो लार्ज पैग बना कर दिए। उससे पहले मुफ्ती की लड़की के कारण आतंकवादियों को छोड़ा गया था और अब दोबारा वहीं गलती की जा रही है। बहरहाल गैरी और फारूक की बात हुई। जैसे ही उनका गिलास खाली हुआ, गैरी ने एक और लार्ज पैग तैयार किया और उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है विमान तैयार है उनकी रिहाई के आदेश जारी कर दो।

लेखक-: विवेक सक्सेना, 

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