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Sunday, 14 May 2017

वास्कोडिगामा ने नहीं की भारत की ख़ोज, प्रचारित किया जा रहा झूठा इतिहास




वास्कोडिगामा (Vasco de gama) ने भारत की ख़ोज की इस तरह का झूठा प्रचार किया जा रहा है। जो यूरोपियन लेख़कों की रची गयी झूठी कहानी है, जिसे भारत में खूब प्रचारित किया गया है। भारत का इतिहास ५००० वर्ष पुराना है, हमारा भारत ऐश्वर्य, वैभवशाली की गौरवगाथाओं से भरा पड़ा है। जिसके प्रमाण इतिहास में मिल जाते है। बच्चों को झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है कि वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की।


क्लाइव, हेंस्टिंग किसके लाॅर्ड थे


जिन मामूली लोगों को भारत में लोग ईस्ट इंण्डिया कंपनी के रौब में आकर लाॅर्ड कहते रहे है, उन्हे ब्रिटिश समाज ने कभी लाॅर्ड माना ही नही है।

जैसे वरेन हेस्टिंग्ज, क्लाइव, कार्नवालिस वेलेजली आदि को केवल भारत में अंग्रेजों के गुलाम लोग लाॅर्ड कहते लिखते थे।

ये सभी ईस्ट इंण्डिया के मामूली अफसर, मैनेजर और नौकर थे। अपने ब्रिटिश मालिकों से जो स्वयं भी ब्रिटिश अभिजन के श्रेष्ठ लोग नहीं थे। झूठ बोलकर और कंपनी को ज्यादा लाभ का प्रलोभन देकर सैनिक टुकड़ियाँ रखने की अनुमति पायी थी। ब्रिटिश राज्य से इनका कोई संबंध नही था। बस लूट के माल में रानी को कमीशन दो और राजकोष मे टैक्स जमा करो। ब्रिटिश लूटेरों को भारत के कुछ मूढ़ इतिहासकारों ने गौरव शाली इतिहास का नाम दिया है


धरती चपटी है, हठ मूर्ख पादरी


कोलम्बस के बाद मेगलेन जब जहाज से सारी धरती धूमकर यरोप लौटा तो कैथोलिक पादरियो का हठ जारी था की धरती चपटी है।


डिस्कवरी नये रास्तों की थी,देश तो वो जानते ही थे


भारत का गौरवशाली इतिहास रहा है, जब भारत मे समुद्रगुत्त, चन्द्रगुत्त, कुमार गुत्त का ऐश्वर्य से संपन्न वैभवशाली सम्राज्य था। उस समय यूरोप भूख़मरी, कंगाली, लूटमार से त्रस्त था, वहाँ के लोग सुख समृद्धि की तलाश में बाहर भाग रहे थे। लेकिन सबसे बड़ी समस्या जलमार्ग के तलाश में आयी, सभी व्यापारी मार्गो पर तुर्को का कब्जा था। इसलिए कोलम्बस और वास्कोडिगामा को इंडीज (भारत) पहुँचने के लिए नये मार्ग तलाशने पड़े। वे जो खोज़ रहे थे वो नये रास्तें थे न कि नये देश। यूरोपियन को भारत के बारे मे वहाँ की समृद्धी के बारें‌में सब पता था, वे भारत पहुँचने के वैकल्पिक रास्तें तलाश रहे थे।


लूट की मनोदशा


इसी समय, जहाँ स्पेन, पुर्तगाल, हाॅलैंड, फ्राँस, इंग्लैण्ड सभी के साहसिक लुटेरे नाविक दुनियाँ में समृद्धि की खोज में जोखिम भरी यात्राये कर रहे थे, वे परस्पर एक दूसरे को लूट रहे थे। रानी एलिजाबेथ ने स्वयं हाॅकिन्स और ड्रेक जैसे समुद्री डकैतों से सम्पर्क कर उनहे स्पेन के माॅल भरे जहाजों को लूट लरने को कहा। और लूट के माॅल मे आधा हिस्सा लेकर लूट-पात करने को उकसाती रही।


महामारी, बेरोजगारी से त्रस्त यूरोप


रोमन कैथोलिक चर्च के आततायी और दमनपूर्ण व्यहार से यूरोपिय समाज त्रस्त था। चर्च नागरिक जीवन के प्रत्येक पहलुओं में दखलनदाजी़ करता था। लाखों लोगों ने यूरोप छोड़ दिया। लंदन के पुराने बीहड टेम्स नदी के पुल को नर खोपडियों से सजाया जाता था। ताकि इस भयंकर मंजर को देखकर साधारण जनता कानून पर अड़िग रहे। उस समय की दया भावना और मानवता को स्काॅटलैण्ड की संसद मे १६६५ में पारित विधेयक से समझा जा सकता है। कुपोषण, भुखमरी, महामारी लडा़इयाँ, मृत्यु दर के बावजूद जनसंख्या में वृद्धि अंग्रेजों के स्थायी जीवन के कुछ लक्षण थे।


यूरोप की सामान्य स्थिति की विवेचना करते हुए फाॅकनर लिखते है, कि पंद्रहवीं शताब्दी में युरोप जड़ समाज था लोगों की भीड़ भरी पड़ी थी, लोग बेरोजगारी और भूखमरी से मर रहे थे।


सर जाॅन विलियम ड्रेपर लिखते है कि किसानों के धर फूस के थे जिस पर मिट्टी का लेप लगा रहता था। बिना चूल्हों-चिमनियों वाले अक्सर ये चूल्हें सड़ी मिट्टी के बने थे, सड़कों पर उच्चके थे। तथा जल-दस्यु और कपड़े तथा चरपाई खटमल तथा पिस्सू से भरे पड़े थे। रोटी चावल का नाम तक नही जानते थे, मटर, मोठ की जड़े तथा छाल मुख्य भोज़न था। महामारी और कंगाली की मार थी, शहरी लोगों की हालत ग्वारों से बदतर थी। अच्छे धर के लोगों का पहनावा चमड़े की खाल थी। गरीब बदन पर धास-फ़ूस लपेटे रहते थे। ऐसा राष्ट्र की वहा के गणमान्य संसद में न पढ़ सकते थे न लिख सकते थे।


सत्राहवीं सदी का लंदन


सत्राहवी शताब्दी के अन्त तक लंदन इतना गंदा था, बैठने के ढ़ग के बिना जंगली जानवर इधर-उधर सड़कों पर धूमा करते थे। बरसाती मौसम में सड़कों पर चलना दुष्कर था। सामाजिक अनुशासन कोशों दूर था, पति अपनी पत्नियों को बेड़ियों में बाँधकर सड़कों पर छोड़ देते थे, तथा कोड़े से पिटाई करते थे। रात को लंदन में अपनी जोखिम पर ही निकला जा सकता था। इंग्लैण्ड की महारानी भी इसी अत्याचार में सम्मिलित रहती थी।


लुटेरी रानी, डकैतों को बनाया शाही सेनापति


रूथ बताती है कि जब हाकिन्स दुबारा १५६४ में गुलामों‌ की तिजारत के लिए निकला तो इंग्लैण्ड की रानी ने स्वयं सबसे बड़े जहाज 'जीसस आॅफ ल्यूबेक' को चार्टर किया। इस यात्रा पर मिला मिनाफा निवेश का ६० प्रतिशत था‌। रानी इतनी संतुष्ट हुयी की उसे राजकीय सम्मान दिया। 1567 में हाकिन्स तीसरी बार मुहिम पर निकला तो रानी उस जोखिम में शेयर होल्डर( share holder) थी। और रानी ने उसे दो जहाज दिये जिसे ज्वाइंट स्टाॅक कंपनी कहा गया। शताब्दी के शुरु में साऊथ सी बबल के छूटने के काल तक स्टाॅक ज्वाइंट खूब फला-फूला।

इस यात्रा में हाकिन्स ने स्पेन के सोने-चाँदी से लदे जहाजों को लूट लिया और उसे रानी के जहाज में लादकर लंदन ले आया। इसके एवज में प्रफुल्लित रानी ने हाकिन्स को राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौप दी, इस तरह से एक खूखाँर लूटेरा नवल कमांडर बन गया।


वास्कोडिगामा और भारत (Discovery of India) जिसे नाम दिया गया


भारत कहाँ है यह तो पता ही नहीं था, भारत कैसा है ये तो सबकों पता था। स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैण्ड, हाॅलैंड, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, और भी शेष यूरोपीय देशों के पास थे तो सिर्फ सपनें हवा-हवाई बाते और किस्से कहानियाँ।

समुद्रज्ञनियों को तब यह भी नहीं पता था कि जिब्राल्टर के सवा तीन हजार मील पश्चिम में इतने विराट दो महाद्वीप हैं। उन महाद्वीपों को पारकर धरती के आधे गोलार्ध में मिलेगा प्रशान्त महासागर और यह सब पार कर हिन्दमहासागर में प्रवेश कर द्वीप पारकर मिलेगा उनके सपनों का इंडीज।

अंत मे वास्कोडिगामा को वह सौभाग्य प्रात्त हो गया कि १४९८ में भारत के मालबार तट जा पहुँचा। इस पुर्तगाली नाविक को भाग्य से कुछ भारतीय नाविक मिल गये थे जो हिन्दमहासागर के व्यापारिक जलमार्ग से परिचित थे।

वास्कोडिगामा के बाद अनेक पुर्तगाली नाविक भारत आये, वहाँ से चीन और पूर्व एशिया के अनेकों द्वीपों तक पहुंचे, लेकिन अंग्रेज इतने भाग्यशाली नही सिद्ध हुए। उन्हें अगले १०० सालों तक काले महासागरों में असफल भटकना पड़ा "इंडीज" का मार्ग तलाशने में।

इस प्रकार हम देखते हैं कि वास्कोडिगामा तो भारतीय नाविकों द्वारा बताये गये रास्तें की वजह से भारत पहुँचा था।