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Thursday, 11 May 2017

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा

SABDBAN

"मछली जल कि रानी है जीवन उसका पानी है"

यह कवाहत हर किसी ने बचपन में सुनी होगी, और पढ़ी भी होगी हमारा पूरा बचपन इन्ही चंद पंक्तियों के आस-पास ही व्यतीत हुआ है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि सिर्फ मछली का जीवन ही पानी नही है। अपितु समस्त प्राणियों का जीवन ही पानी है, जल ही जीवन है जैसे पंक्तियों को हर किसी ने पढ़ा होगा किन्तु कितने ऐसे मनीषि है जो इन पंक्तियों के भावों को पढ़ते है, कितना बड़ा संदेश छुपा है इन चंद लाइनों में किन्तु आज मनुष्य सभी कुछ प्रत्यक्ष रुप से धटित होते देखने के बाद भी नही चेत रहा है। उपभोक्ता एवं संरक्षणवादीवादी संस्कृतियों से परिपोषित आज का समाज आधुनिकता की चादर ओढ़े जिन्दा मानव बम बना धूम रहा है। उसे अपने अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ एवं स्वछंद वातावरण देने की तानिक मात्र चिन्ता नहीं है। यह अत्यंत विचारणीय विषय है कि क्या हमारे पूर्वज अपनी विरासत हमकों दोहन करने के लिए देकर गये थे या सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए संपदाओं का अहित करने के लिए। मनुष्य अपने आने वाली पीढ़ी की चिन्ता किये बिना आज इतना लोभी और स्वार्थी हो गया है, कि वह लगातार हमारी प्राकृतिक निमित एवं संपदाओं का दोहन कर रहा है।जल तेरे बिना सब सूना सूना कितनि मार्मिक पंक्तियाँ है । बचपन में जब हम मम कहकर जल को पकारते थे, उस समय बच्चे की तोतली जुबान सुनकर माता-पिता को कितनी आत्मिक शान्ति की अनुभूति होती थी इसकी हम परिकल्पना भी नही कर सकते। किन्तु हम अपने आने वाली पीढ़ी को शायद ऐसा बचपन देकर नही जा रहे हैं जिससे आने वाली पीढ़ी को आत्मिक शान्ती की अनुभूति हो सके और जल को मम कहकर परिभाषित किया जा सके। आखिर हम कब चेतेंगे, आज पूरा विश्व जल संकट से गुजर रहा है।
कुछ विद्वानों का कथन तो यह भी है कि आने वाला तृतीय विश्व युद्ध जलसंपदाओं को लेकर ही लड़ा जायेगा। यह बात साफ है कि पृथ्वी पर मानव जीवन के लिए जल अत्यंत अनमोल‌संपदा है, जल के बिना किसी का जीवन संभव नही है चाहें मनुष्य हो या पशु-पक्षी खाना के बिना तो मनुष्य कुछ दिन जीवित रह सकता है, किन्तु जल के बिना एक क्षण भी जीवित रह पाना असंभव है। जीवन जीने से संबंधित हमारी सभी क्रियाओं के लिये जल की नितान्त आवश्यकता है। समग्र विश्व धरती पर चारों तरफ़ (धरती का लगभग तीन-चौथाई भाग) पानी से धिरा हुआ है। किन्तु भारत और दुनिया के दूसरे देश पानी की समस्या से जूझ रहें हैं। क्योंकि महासागर में लगभग पूरे जल का 97% नमकीन पानी है, जो मनुष्य के उपयोग के लिये सही नहीं है। इस धरा पर पर मौजूद पूरे जल का केवल 3% जल ही उपयोग करने लायक है। जिसका 70% भाग बर्फ और ग्लेशियर के रुप मे मौजूद है सिर्फ़ 1% जल ही पीने लायक पानी के रुप में उपलब्ध है।
इन सबसे अनिभिज्ञ मनुष्य लगातार जल और प्राकृतिक संपदाओं का  दोहन कर रहा है। प्रकृति अब इन सबसे रुष्ठ हो गयी है और मनुष्य को चेत जाने के लिए लगातार विकाराल रुप धारण करके विनासलीला दिखा रही है। आज तेजी से समाप्त होते जा रहे प्राकृतिक संसाधन, लगातार सूख रहे जल स्त्रोत एवं कुआँ तथा बावड़ियों का सूखता जल स्त्रोत, नहरों और हैंपपम्पों का लगातार गिरता जलस्तर इसी का परिणाम है। प्रकृति ने मनुष्य द्वारा किये जा रहे उत्पात को लेकर एक संदेश दिया है, कि वक्त रहते अभी नही चेते और जलसंरक्षण, प्राकृतिक संपदाओं का संरक्षण अभी से करना नहीं शुरु किया तो वह दिन दूर नही जब प्रकृति कहर बनकर मनुष्यों पर टूट पड़ेगी और एक-एक बूँद जल के लिए तरसना पड़ेगा।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्डस् ब्यूरो के सर्वेक्षण के अनुसार, ये रिकार्ड किया गया है कि लगभग 16,632 किसान (2,369 महिलाएँ) आत्महत्या के द्वारा अपने जीवन को समाप्त कर चुकें हैं। हालांकि, 14.4% मामले सूखें के कारण घटित हुए हैं। इसलिय हम कह सकते हैं कि भारत और दूससें विकासशील देशों में अशिक्षा, आत्महत्या, लड़ाई और दूसरे सामाजिक मुद्दों का कारण भी पानी की कमी होना है। इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में पड़ रहे आकाल और सूखों का ज्वलंत उदाहरण बुन्देलखण्ड़ है, पानी कि कमी के कारण किसान भूखों‌ मरने के कगार पर आकर खड़े हो गये है। फसलों की पैदावार लगातार धटती जा रही है फसल चक्र का क्रम लगातार टूटता जा रहा हैं जिससे किसान लगातार आत्म हत्या करने जैसे कदम उठाने पर मजबूर है। यह सिर्फ किसानों की समस्या नही है, अपितु पूरे विश्व की समस्या है जब अन्नदाता ही भूखों मरने के कगार पर खड़ा हो जायेगा तो पूरे विश्व का क्या होगा आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, यह साफ संकेत है कि हम स्वयं विनासलीला की ओर अग्रसर हो रहे है, जिसका जिम्मेदार मनुष्य स्वयं हैं। सूखे का एक हद्धयविदारक एवं मर्म स्पर्शी उदाहरण यह भी है कि लातूर में लगभग 2000 की संख्या में पक्षी पानी न मिलने से मृत पाये गये थे। यह मनुष्य जाति के लिए उतनी मार्मिक धटना नहीं हो सकती क्योकि यह विपत्ति अभी उन्के बच्चों पर नही आयी है, किन्तु उसी काल के दौर से हम भी गुजर रहे है।
औधोगिक क्रांति के दौर से पहले धरती पर छह अरब हेक्टेयर वन क्षेत्र थे, जो अब धटकर चार अरब रह गये है। 22 अप्रैल को विश्व के 177 देशों ने मिलकर विश्व पृथ्वी दिवस मनाया किन्तु इस रिर्पोर्ट को देखकर हम समझ सकते है कि हम पृथ्वी बचाने के प्रति हम कितने संजीदा है
आईयूसीएन कि रेड़ लिस्ट रिपोर्ट के अनुसार 2012 तक 121 जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर है एवं 737 प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी है, 2261 प्रजातियाँ खतरे में है। विश्व के 92% लोग वायु प्रदूषण की चपेट मे है एवं प्रतिवर्ष 30 लाख लोग इससे मरते है। नदियाँ संकट के दौर से गुजर रही है एवं अपनी गुणवत्ता खोती जा रही है 70% नदियाँ विलुप्त होने के कगार पर है। अन्तर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संसथान के अनुसार 1.2 अरब लोग भौतिक जल संकट से गुजर रहे है, एवं 1.6 आर्थिक जल संकट से लगभग 78 करोड़ लोग स्वच्छ पीने योग्य जल से वंचित हैं और 25 करोड़ लोग प्रदूषित जल से प्रति वर्ष प्राण त्याग रहे है।

हमारे समाज द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण की वजह से प्रकृति हमसे रुष्ट हो गयी है जो कुछ चल रहा है उसे देखकर लगता है कि वह अगले दिन अपने आपे से बाहर होकर अपना क्रोध व्यक्त करेगी अदृश्य जगत में चल रही गतिविधियों का पर्यवेक्षण करने वालो का कथन है कि वातावरण का तापमान ग्रीन हाउस गैसों की वजह से बढ़ रहा है। यही क्रम चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब धुव्रों की बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी और समुद्र के पानी की सतह मीटरों ऊपर उठ जायेगी ,जिससे समुद्र तट पर बसे नगरों तथा नीचे बसे भू-भागों में इतना पानी भर जायेगा ,जिससे वर्तमान आबादी और संपदा का बेचा भू -भाग उस विपत्ति के गर्भ मे समा जायेगा। वातावरण में क्लोरों फ्युओरों कार्बन और कार्बन डाई आक्साइड जैसी जहरीली गैसों की मात्रा को देखते हुए वैज्ञानिको ने यह आशंका व्यक्त की है कि अगामी दस वर्ष में जलवायु प्रलयकारी रुप धारण करेगी। कैसर, श्वास रोग, हद्धय रोग जैसी धारक बीमारियाँ इसी की परिणीत है। आकँडे बताते है इन दिनों प्रतिवर्ष वातावरण मे एक पी.पी.एम की दर से कार्बनडाई -आक्साइड भरती जा रही है इस मात्र मे, 30% की अभिवृद्धि पृथ्वी के तापक्रम को चार डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ा देती है। तापक्रम में यह वृद्घि प्रतिवर्ष ग्रीन हाऊस प्रभाव को जन्म देती है। इन सबका जिम्मेदार स्वयं हमारा समाज और मनुष्य है, यदि मनुष्य अब भी नही चेता तो खुली हवा में साँस लेने के लिए और बूँद-बूदँ पानी के लिए तरस जायेगा तब सिर्फ एक ही शब्द हर किसी के जुबान पर होगा वाह! पानी रे पानी तेरा रंग कैसा।



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