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Saturday, 27 May 2017

जानें भगवान कौन सी प्रार्थना करते है स्वीकार मोक्ष प्रात्ति

प्रार्थना मनुष्य की श्रेष्ठता का प्रतीक है, क्योकि यह भौतिक ज़गत और परमात्मा‌‌ के धनिष्ठ संबंधों‌ को दर्शाती है। प्रार्थना एक तरह से भक्त और परमात्मा के बीच संचार को कहते है।
इसमें कोई अपरिग्रह नहीं होता है।

भक्त ईश्वर के समक्ष अपनी सारी स्थिति स्पष्ट कर देता है, ईश्वर से कुछ छिपाया भी नहीं जा सकता है, क्योकि ईश्वर निराकार और पराबह्रा परमेश्वर है। सभी धर्म गुरुओं, ग्रंथों और संतो ने प्रार्थना पर बल दिया है।
प्रार्थना के द्वारा मोक्ष की प्रात्ति की जा सकती है, ऐसा पुराणों में वर्णित है। प्रार्थना में ईश्वर की भक्ति, स्तुति, गुणगान मार्गदर्शन की कामना के साथ ही साथ धन्यवाद एवं समस्त जगत के प्राणियों की मंगलकामना की जाती है। प्रार्थना मौन रहकर या स्मरण करके बोलकर की जा सकती है। यह व्यक्तिगत या समूहिक रुप से हो सकती है, जिसमे धर्म ग्रंथो को पढ़ने के साथ ही संगीत को माध्यम बनाया जा सकता है,
 प्रार्थना में माला, जप, गुणगान आदि किया जाता है।
 इसे बिना किसी माध्यम के सहारे भी किया जा सकता है, प्रार्थना करने की सारी विधियां सर्वश्रेष्ठ है, किसी भी विधी के माध्यम से प्रार्थना किया जा सकता है। इसमे जितना समर्पण, तन्यता, सद्भभाव होगा फ़ल उतना ही फ़लीभूत होगा। वैसे तो प्रार्थना कभी भी कही भी की जा सकती है किन्तु प्रातः काल‌ की बेला एवं सायं काल में की गयी प्रार्थना अत्यंत शुभ एवं मंगलकारी होती है।
प्रार्थना का स्थान सुनिश्वित, शान्त एवं स्थायी होना चाहिए जहाँ ध्यान एवं एकग्रता भंग न हो। स्थान स्वच्छ मनोरम और खुला होना चाहिए। प्रकृति की गोद में मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च इसके लिए उपयुक्त स्थान मानें जाते है, जहाँ ईश्वर की अदृश्य जगत की शक्तियाँ विघमान रहती है। प्रार्थना के समय मन में एकाग्रता होनी चाहिए, महार्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानंद, बुद्ध, परमपूज्य गुरुदेव आदि महान पवित्र तपस्वियों को ईश्वर पर अटटू विश्वास था। जिसकी वजह से उन्होने तप, साधना करके चरमोत्कर्ष को प्रात्त किया एवं अपने मार्ग पर अड़िग रहकर विश्व के कल्याण की योजनाएँ बनायी जो आज फ़लीभूत हो रही है।

प्रार्थना का अर्थ-:

प्रार्थना का अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन, जीवात्मा के साथ भक्तिमय, अनन्य, सक्रिय प्रेममय मिलन को प्रार्थना कहते है। ईश्वर प्रात्ति के लिए आदर्श प्रार्थना, आतर्ता, या भावभिक्ति की ब्याकुलता है।
अतः हम ईश्वर की प्रार्थना जिस भाव के साथ करेगें फ़ल भी उसी के अनुरुप प्रात्त होगा। सभी धर्म ग्रंथों में यह वर्णित है कि हम जिस भाव से ईश्वर की प्रार्थना करते है ईश्वर उसी भाव दे एं फ़ल देता है, अतः प्रार्थना करते समय हद्धय एवं मन पवित्र रहना चाहिए।

रामायण मे एक चौपाई है, जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी
     अर्थात हम जिस भाव से ईश्वर की प्रार्थना करेगें ईध्वर उसी भाव से हमें फ़ल देगा।

क्या है प्रार्थना..?

प्रार्थना एक धार्मिक क्रिया है, जिसमें अखिल विश्व की अदृश्य जगत की शक्तियों को यानी ईश्वर से स्वयं को जोड़ने का कार्य किया जाता है। प्रार्थना निवेदन के माध्यम से ऊर्जा एवं मनोयोग प्रात्त करने की शक्ति है।

ईश्वर प्रात्ति का सहज़ मार्ग

भारत एक धर्म एवं कर्म प्रधान देश है, जहाँ के कण-कण में यहाँ की संस्कृति में ईश्वर विघमान हैं। सुबह की दैनिक क्रिया से निवृत्ति होनें के बाद मनुष्य प्रार्थना के लिए ईश्वर के समक्ष होता है, पूजा के पश्चात प्रार्थना का अलग महत्व है प्रार्थना अर्थात् स्वयं को सीधा ईश्वर से जोड़कर संबंध स्थापित करना है।


परमेश्वर से संचार करना

प्रार्थना और कुछ नहीं सिर्फ़ ईश्वर से संचार करना है, आप ईश्वर को जानते है ईश्वर आपको जानता है। तथा वह यह भी भलीभाँति जानता है कि आपके हद्धय का व्यवहार कैसा है। वह उसी के अनुरुप आपको फ़ल देता है।

ईश्वर प्रात्ति का सहज़ मार्ग

ईश्वर एवं आध्यात्मिक शक्तियों को प्रात्त करने की दो विधियाँ है, भक्ति मार्ग में प्रार्थना और ध्यान दोनों बताया गया है, किन्तु ध्यान का मार्ग अत्यन्त दुरूह है, किन्तु प्रार्थना करके आसानी से ईश्वर को प्रात्त कर सकते है।

भगवान से विनती

भगवान से हमेशा गुण ग्रहण करने की ही कामना करना चाहिए। प्रार्थना के साथ उसे आचरण में भी लाये तभी प्रार्थना फ़लीभूत होगीं और उचित फ़ल मिलेगा। अगर प्रार्थना किया जाये और उसे आचरण में न लाया जाये तो वह हितकारी नहीं होगी। भगवान से सैदव समाजकल्याण, की कामना करनी चाहिए, बंग्ला, गाड़ी, वैभव, ऐश्वर्य माँगना अनुचित है, तदापि अहितकारी एवं अनुचित फ़ल प्रदान करता है।


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