गुत्त रोग आखिर कितना गुत्त sexual education - शब्दबाण

शब्दबाण

सकारात्मकता का संदेशवाहक सबसे तेज ! सबसे आगे !

Wednesday, 31 May 2017

गुत्त रोग आखिर कितना गुत्त sexual education

कितनी बड़ी बिडम्बना है, ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को एक शरीरिक संरचना प्रदान की है। ज़िसे हम शरीर के रुप में परिभाषित करते है। मनुष्य का शरीर कोशिकाओं, संरचाओं, तंत्रिकाओं का जाल है। इस हाड़-माँस के शरीर में सभी अंग एक समान है, एंव सभी अंगों की अपनी अलग पहचान एवं कार्यशैली है। जब हम हाथ, पैर, मुँह, कान आदि की बातें करते है तो निःसंकोच करते है।
ठीक इसी प्रकार से हमारी शारीरिक संरचनाओं में एक अंग है जिसे गुत्ताँग बोला जाता है। अरे मैं पूछता हूँ काहे का गुत्ताँग जब हम शरीर के सभी अंगों के बारे में बेवाक टिप्पणी करते हुए दिखायी देते है तब कोई शर्म महसूस नहीं होती है किन्तु बात जब गुत्ताँग की आती है तो दूसरों के बगले झाकते दिखायी देते है। मैं कहता हूँ गुत्ताँग आखिर कितना गुत्त है। क्यो गुत्त है, अन्य शारीरिक अंगों की तरह वो भी हमारे शरीर का एक हिस्सा और अभिन्न अंग है। हमारी इंद्रियों में एक इंद्री यह भी है।

सेक्स(sex education) को हमारे कोर्स में शामिल करके उचित शिक्षा देने की आज़ अवश्यकता महसूस की जा रही है। सेक्स हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, जिसके बारें में हर कोई जानने को उत्सुक रहता है, कम उम्र में सेक्स का अधूरा ज्ञान युवाओं‌ को भटकाव की ओर ले जा रहा है। अपने गुत्त अंग को जानने की अपेक्षा रखने की वजह से बलात्कार जैसे धिनौनें एवं जधन्य अपराधों का जन्म हो रहा है।
आज़ का युवा भटकाव की ओर है, सेक्स शिक्षा के प्रति जागरुकता न होने की वजह से युवाओं‌ में अनेकों भ्रान्तियाँ एवं रोग पनप रहे है। जब हमारे शैक्षणिक विषय वस्तु में सारी शिक्षायें शामिल है, बायोलाॅजी में सभी तंत्रिकाओं का क्रिया विज्ञान पढ़ाया जा रहा है तो आखिर युवाओं को, बच्चों को सेक्स शिक्षा से क्यो दूर रखा जा रहा है यह विषय अभी भी गूढ़ विज्ञान और रहस्यमय ग्रहों‌ की खोज़ जैसा बना हुआ है।

 भटकाव की ओर युवा



आज़ का युवा सेक्स शिक्षा के अधूरेपन की वज़ह से भटकाव की ओर है, जिधर भी नज़र उठाकर देख लो पूरे देश की दीवारें सेक्स समस्या के समाधान के इश्तहारों से पेंट की हुयी पड़ी है मानो जीवन रक्षक दवाओं‌ की ख़ोज नीम हकिमों ने कर ली है जो इसको ग्रहण कर लेगा आजीवन जवान रहेगा।

पहले आओ पहले पाओ का मूलमंत्र युवाओं पर हावी है
नीम-हकीमों के इश्तहार देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है
मानो पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा नामर्द भारत देश में पाये जाते, एक जुमला याद आ रहा है इन्की दवाईयाँ ऐसी है जो बूढ़े को भी जवान बना दे एक भी युवा छूट गया तो मानों सुरक्षा चक्र टूट गया।

अरबों का खेल बना सेक्स रोगों का व्यापार


युवाओं के भटकाव का सबसे ज्यादा फ़ायदा अगर किसी को होता है तो नीम-हकीमों को होता है, इसी खेल में अरबों का व्यापार हो रहा है आज सेक्स रोगों की दावाओं का व्यापार १ अरब रुपये सलाना से भी ऊपर है‌। इसके मूल में जाया जाये तो पता चलता है इसके जिम्मेदार हम स्वयं एवं हमारा समाज़ है। हमारी सरकार और शिक्षा प्रणाली कम दोषी नही है। दोस्त यार मित्रों और रिश्तेदारों से अधकचरा ज्ञान प्रात्त करके हम नीम-हकीमों‌ के चक्कर में पड़कर अपना पैसा और समय दोनो बर्बाद कर देते है। अन्तः में थकहार कर तनाव जैसी स्थिति में पहुच जाते है बहुत सारे युवा तो आत्महत्या जैसे कृत्य भी कर लेते है।


समाज में फ़ैली भ्रतियाँ जो‌ नीम-हकीमों और मित्रों रिश्तेदारों द्वारा फ़ैलायी गयी है

  1. हस्थमैथुन अपराध है-: कहते है अति भली न बोलना अति की भली न धूप, अति की भली न बरसना अति की भली न चूप अति किसी भी चीज़ की हानिकारक होती है। अवश्यकता से अधिक हस्तमैथुन करना हानिकारक हो सकता है, किन्तु हस्तमैथुन करके अपराध बोध से ग्रसित होना अपरिहार्य है क्योकि यह हमारे दैनिक क्रिया का हिस्सा है।
  2. बीबी को संतुष्ट नही कर पाओगें- जबकि ऐसा कुछ नही है प्रत्येक मनुष्य में अपार शक्ति होती है।
ढ़ेढापन, पतलापन, छोटा-बड़ा,- ये भ्रंतियाँ हमें‌ हर जगह चौराहों पर दीवारों पर बस-अड्डों पर मिल जायेगीं जो इश्तहारों के रुप में होती है जो डाक्टरों, हकीमों द्वारा फ़ैलायी गयी है। भाई धंधा है चोख़ा होना चाहिए तभी तो मुर्गा फ़सेगा।



सेक्स रोगों‌ का मायाजाल

यह मायाजाल इतना दुरुह है कि इसमें फ़सने के बाद निकलना उतना ही मुश्किल है जितना जाल में फ़सी मछली का। यह मायाजाल किसी पेशेवर जादूगर की हेप्नोटिज्म(Hepnotism) की तरह है जो एक बार सम्मोहित हो गया तो फ़िर मोहपास में फ़सकर मदारी के डमरु की तरह हो जाता है, जितना चाहो उतना बजाओं इसकी अतल गहराईं मे जाकर इंसान तभी बाहर निकल पाता है जब कुछ करने को बचता नहीं है। सिर्फ़ पछतावा और मायूसी हाथ आती है साथ में धन और समय की बर्बादी एक्सक्लुसिव (exclusive) आईटम है। नपुंसकता, धातुरोग, पतला-मोटा, नामर्द रोगी मिलें हर शुक्रवार शीध्रपतन, निःसंतान रोगी मिले ऐसा लगता है पूरी दुनिया में जो इंसान है सब इन्की ही पैदाइश है। पूरी श्रृष्टि की रचना ईश्वर के द्वारा नही अपितु इनके द्वारा ही की गयी है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।


आधुनिक समाज़ के साथ आधुनिक होते सेक्स रोग


इस भागदौड़ भरी जि़न्दगी में आधुनिकता हावी होती जा रही है। समाज़ आधुनिक हुआ, रहन-सहन आधुनिक हुआ, बस की ज़गह ट्रेनों और ट्रेनों की ज़गह ऐरोप्लेनों ने ले लिया। झोपड़ी गगनचुम्बी इमारतों‌ में परिवर्तित हो गयी तो भाई बीमारी का भी आधुनिक होना बनता है, नहीं तो बड़ी नाइंसाफ़ी होगी माई-लार्ड बीमारियों के साथ पहले के आयर्वेद ग्रंथों में कुछ सेक्स बीमारियों का अवलेख़ मिलता है। किन्तु सबका समाधान भी आयर्वेद में समाहित है।

 आज़कल यह रोग इतना ज़टिल बना दिया गया है मानों आपके सारे ह्युमन राइटस छिन गये है(Humen rights)
आप समाज़ में रहने के हकदार नहीं है बहुत बड़ा गुनाह कर दिया आपने किन्तु ऐसा कुछ नहीं है यह हकीमों और डाक्टरों का मायाजाल होनें के साथ ही सामाजिक भ्रांतियाँ है।

एरेक्टाइल डिस्फ़क्सन(erectile dysfunction)


यह आधुनिक समाज़ की आधुनिक बीमारी है, पूर्वजों ने शायद ही यह नाम सुना होगा। किन्तु आजकल प्राइम टाइम में चलता है सेक्स रोग के डाक्टरों के क्लीनिक में यह बीमारी।

हिन्दी में हिजड़ा, उर्दू में नपुंसकता और आयर्वेद में
स्तंभन दोष कहते है जबकि यह कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है, किसी डाक्टर या नीम-हकीम के पास जाओगें आपको ऐसा बोध कराया जायेगा मानों आपकी ज़ीवन रुपी नैय्या डूब गयी है, बचने के लिए पतवार की अवश्यकता है जो सिर्फ़ इनके पास ही मिलेगा इस मूलमंत्र का कापीराइट जो है (copy right) इनके पास इलाज़ खर्च डाक्टर के अनुसार 10 हजार से १०लाख तक हो सकता है।

शीध्रपतन (premeture ejulation)

जिसे कहते है ज़ल्दी डिस्चार्ज़ हो जाना (early ejulation) जबकि यह कोई बीमारी ही नहीं है। भाई हर किसी की क्षमता का निर्धारण उसकी मनः स्थिति से होती हैं। मस्तिष्क नियंत्रित रहेगा तो यह कोई बीमारी ही नहीं है डाक्टरों के द्वारा फ़ैलायी भ्रांति है इलाज़ ख़र्च १० हजा़र ज्यादा भी हो सकता है।

लो डिजायर, लाॅस आॅफ़ लाइविडो धातु रोग
(loss of libido, low desire, low sperm count, early ejulation)


 यह आधुनिक समाज़ की आधुनिक बीमारी है, धातु रोग जबकि यह कोई बीमारी ही नहीं है भाई जिस तरह से हमारे शरीर मे ं‌खून बनता है वैसे ही स्पर्म‌ बनता है, इसका बनना अनवरत जारी रहता है। किसी में यह मात्रा कम तो किसी में प्रोडक्शन की मात्रा ज़्यादा होती है( production) जब पानी का धड़ा लबालब भर जायेगा तो छलकेगा ही ठीक इसी प्रकार धातु रोग है ज़्यादा स्पर्म बन जाने पर इसको बाहर निकलने का मार्ग चाहिए होता है जो मूत्र मार्ग से निकलता रहता है जिसे हम डाक्टरी भाषा में धातु रोग कहते है अवश्यकता से अधिक हो जाने पर डाक्टरी परामर्श लिया जा सकता है।


ओलिगोस्पर्मियां (oligospermia)

शुक्राणुओं का न बनना या निल हो जाना आधुनिक परिवेश की यह एक और आधुनिक बीमारी है। ऐसा कहा जाता है कि स्पर्म निल हो जानें पर माता-पिता का सुख नही भोगा जा सकता देश के 99% युवा इसी को लेकर चिन्तित रहते है।

जब्कि जिस तरह से हमारे शरीर में अस्थि, माँस, मज्जा और रक्त बनता है वैसे ही शुक्राणु (sperm) लगातार बनते रहते है तो निल होने या न बनने का सवाल ही नहीं उठता है।
हाँ कोई और कारण हो सकता है कि आप बाप नहीं बन पा रहे है। अगर ऐसी समस्या है तो क्वालीफ़ाइड़ डाक्टर की सलाह अवश्य ले नीम-हकीम के पास जाने की अपेक्षा।

सेक्स समस्याओं का मूल कहा है



सभी प्रकार की सेक्स समस्याएँ (sexual problem) की उत्पत्ति हमारे मस्तिष्क से होती है क्योकि हमारे पूरे शरीर का केन्द्र बिन्दु हमारा मस्तिष्क है जो हमारे पूरे शरीर को नियंत्रित करता है। 

सेक्स समस्याएँ शारीरिक एवं मानसिक दोनो प्रकार की हो सकती है ज़्यादातर मामलों‌ में देखा गया है कि सेक्स रोग शारीरिक न होकर मानसिक ज्यादा होते है। 
अतः इस प्रकार की समस्या होने पर निराश न हो क्योकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अपरिहार्य बीमारियों को छोड़कर सभी का इलाज़ संभव है। 



एलोपैथ में सिल्डनाफिल साइट्रेट seldinafil cytrate) से इसका इलाज किया जाता है साथ में कुछ मानसिक रोगों की दवाईयाँ चलायी जाती है। साथ में मीटा-१५ (meet-१५)  (lycopene) multiminiral, antioxidant medicine prescribe की जाती है।





आयर्वेद में शतावरी, अश्वगंधा, सफ़ेद मूसली, काली मूसली, सालमपंजा, मिश्री, गोरखमुंडी आदि आयर्वेदिक जेड़ीबूटियों का प्रयोग किया जाता है।


जो मानसिक के साथ-साथ शारीरिक शक्ततियों में अभिवृद्वि करती है। यह सेक्स रोग के निवारण के लिए अचूक रामबाण औषधि है।

ज़्यादातर सेक्स बीमारियों में अज्ञानता, भ्रांतियाँ एवं सटीक ज्ञान न होना पतन का कारण बनता है, सेक्स शिक्षा का अभाव एक महत्वपूर्ण कारक है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हमारे समाज ने गुत्त रोगों को इतना गुत्त बना दिया है कि बच्चा अपने माता-पिता से भी इस बारें‌ में संकोच और भयवश बातचीत नहीं कर पाता है। और डिप्रेशन(depression) इसोमेनियां (insomnia) चिंता (Anixity) का शिकार हो जाता है या फ़िर नीम-हकीम के भ्रामक जाल में फ़सकर अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति क्षीण कर देता है।
सबसे अहम पृष्ठभूमि एवं भूमिका हमारे निकट संबंधी और मित्र बनाते है जो स्वयं इन पहलुओं से अनजान होते है।
शीध्रपतन की इस बीमारी में हमारा भी शीध्र पतन ही हो जाता है।




नोट-: इस लेख का उददेश्य सेक्स शिक्षा के प्रति जागरुकता फ़ैलाना है, न कि डाक्टरी उपचार करना अतः किसी भी प्रकार की सेक्स संबंधी समस्याँ होने पर इस लेख में बतायी दवाइयों का प्रयोग न करे कृप्या वरिष्ठ मनोचिकित्सक या सेक्सोलाजिस्ट से परामर्श ले अन्यथा आप इसके जिम्मेदार स्वयं होगें। 
सरकार को सेक्स शिक्षा के प्रति युवाओं को जागरुक करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए एवं सेक्स शिक्षा को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।




No comments:

Post a Comment