शिक्षा का दशरथ राम माँझी - शब्दबाण

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Sunday, 28 May 2017

शिक्षा का दशरथ राम माँझी

मनेहरा..फखरपुर के गाँव का एक हिस्सा जो अपनी गरीबी को पूरी नग्नता से नुमायां करता आपको सामने खड़ा मिलेगा.पूरे गाँव मे शायद आपको दो घर पक्के बने मिल जाएँ.गाँव के मर्दों को काम मिला तो ठीक नही मिला तो दुपहरिया ताश या जुआ खेलने में कटती है.औरतें बच्चों के सिर से चीलर बीनते,गाली गलौज करते और बच्चे माँ की मार खाते बाप की गालियाँ सुनते और बकरियाँ चराते दिन गुजार देते हैं.लोक भाषा मे यह एक 'सुदहट' गाँव है इसीलिए सरकारी स्कूल और पढ़ाई की तमाम लुभावनी योजनाएँ यहाँ बच्चों को स्कूल तक ला पाने में नाकाम हैं.सर्व शिक्षा अभियान के तहत पौने दो सौ के नामांकन के सापेक्ष डेढ़ वर्ष पहले तक उपथिति बमुश्किल 10 या 15 बच्चों के बीच रहती थी.
कल मैंने वह स्कूल देखा.164 में 121 उपस्थित थे.उनकी कॉपियाँ देखीं,उनकी गतिविधियाँ देखीं. बच्चे खुद ही अपनी कॉपियों की गवाही थे.कक्षा 4 के बच्चे भारत के पड़ोसी देश उनकी राजधानियों के बारे में बता रहे हैं.कौन सी नदी किस सागर में गिरती है.सभी महाद्वीपों के नाम भारत किस महाद्वीप में है.यह सब बताने के लिए उनको नक्शे की ओर देखना नही पड़ता.कर्क रेखा, मकर रेखा और भूमध्य रेखा के बारे में भी वो जानते हैं.इनकी कॉपी आपको कल ही दिखा चुकी हूँ.
अब आइए बच्चों की कहानी सुनिए.हर बच्चे की एक कहानी है..
अमरजीत,जिसे गाँव वाले पागल कहते थे आंगनबाड़ी स्कूल में बैठने नही देती थी क्योंकि वह अद्धा खींचकर मार देता था.आज वह कक्षा एक का मॉनिटर है,धारा प्रवाह हिंदी और अंग्रेजी की कविता सुनाता है और अब गाँव वाले उसको पंकज सर का चेला कहते हैं.
कौशल्या..कक्षा 3 की बच्ची.कौशल्या की माँ किसी के साथ भाग गई हैं और बाप दूसरी ब्याह लाया है..रसोईया फुसफुसाकर बताती है. अब कौशल्या स्कूल आने में नागा करने लगी है.
कौशल्या..स्कूल क्यों नही आती बच्चे?अच्छा नही लगता स्कूल?- मैं पूछती हूँ
जी अच्छा लगता है,नइकी अम्मा आने नही देती हैं.
क्यों? घर पर क्या करती हो?
जी खाना बनाइत है,बर्तन माँजित है, चौका लगाइत है..कहते-कहते कौशल्या की आँखें भर आती हैं..मेरी भी..
कौशल्या की नई अम्मा से मिलना चाहती हूँ लेकिन वह बहराइच गई हैं.
लोग कहते हैं कि प्राइमरी के टीचर को समाज ने सम्मान देना बंद कर दिया है.यकीन नही होता क्योंकि गाँव के बीच से गुजरते हुए एक माँ हाथ थाम लेती है.मैडम जी!स्कूल आई हो तो पानी पीकर जाओ..टटोलकर दो रु बच्चे को पकड़ाती है..जा रे! बिस्कुट लई आव.एक लड़की भागकर लोटा माँजकर पानी लाती है.दुपहर होइगा है मैडम जी घाम तपत है.आप आराम करो.रोटी बनाय दी खाय लेव..इस नेह से हाथ छुड़ाना कितना कठिन है.यह वही समझ सकते हैं जो कभी इस नेहपाश मे बंधे हैं.
स्कूल का यह काया कल्प एक दिन में नही हुआ.यह डेढ़ वर्ष में Pankaj Srivastav और राजेश प्रजापति के जुनून का प्रतिफल है.ऐसे अध्यापक बेसिक शिक्षा के 'दशरथ मांझी' हैं.
                  पंकज...जुलाई में स्कूल खुले तो सभी बच्चों को जरूरत के हिसाब से कॉपी,पेंसिल,कलर बॉक्स और सारी जरूरी स्टेशनरी दिलाकर बिल मुझे दे देना..मैं चलते-चलते बस इतना ही कह पाती हूँ.आगे नही कह पाती कि तुम्हारे जुनून के आगे बस इतनी ही औकात है मेरी...

आपने अगर लिख लिया हो तो कक्षा- 4 के अमन से चेक करा लीजिए.

मधुलिका चौधरी
शिक्षिका(लेखिका)
सामाज़िक मुद्दों पर बेवाक लेखनी

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