हाँ हिन्दी हूँ मैं - शब्दबाण

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Friday, 31 March 2017

हाँ हिन्दी हूँ मैं


भरा नही जो भावो से जिसमे बहती रसधार नही, हद्धय नहीं वह पत्थर है जिसको हिन्दीं से प्यार नही 

पुराणों की बात करें तो कहा जाता हैं कि जब अर्जुन अपनी पत्नी द्रौपदीं को द्धार भेदने का बोध करवा रहे थे उस समय अभिमन्यु अपनी माँ के कोख में उनकी बातें सुन रहे थे । छः द्धारों को भेदने की कथा सुनने के बाद द्रौपदी को नींद आ गयी और वो सो गयी इस प्रकार अभिमन्यु को केवल छः द्धार भेदने की कला का बोध हो पाया । 
और युद्ध के दौरान वे सातवें द्धार को भेदने के दौरान वीरगति को प्रात्त हो गये क्योकि उनको छः द्धार भेदने का ही बोध था । इसी तरह कहते है कि हमारे माता-पिता के संस्कार हमे कोख मे ही आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है, संस्कारी माँ-बाप होने पर ही बेटा संस्कारी होता हैं ।
तो आखिर हमारी मातृभाषा हमारी माँ हिन्दी के संस्कार मे क्या कमीं रह गयी थी जो आज हमारी माँ को ही हर जगह उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है । जब चलना भी नही आता था, बोलना भी नही आता था ।
नवांकुरण पौधे के भाँति नयी कोपले आयी थी, अर्थात जब हम पहली बार इस संसार के भाव विह्गम यात्रा पर आये थे, तो पहला शब्द क्या बोला था ।
माँ माँ माँ क्योकि माँ ही वह शब्द है जो हमे कोमलता का अहसास करवाता है, संवेदनशीलता का अहसास करवाता है ।
माँ प्रेम है, अहसास है फिर क्यो आज हम अपनी माँ को भूलते जा रहे है, वही माँ हिन्दी आज हमे इतनी अप्रिय भाषा लगने लगी । जिसे संसार मे आते ही पुकारा था माँ । वो हिन्दी ही थी जिसने माँ होने का अहसास करवाया प्रेम का पाठ पढ़ाया पैदा होते ही शायद किसी ने मदर बोला हो, किसी ने फादर बोला हो,
पा पा पा बोलना सीखाया जिसने वो हिन्दी ही थी जिसने असीम प्रेम के बंधन के रस रुपी सागर को प्रवाहित किया ।
हाँ मै हिन्दी हूँ डाक्टर, इन्जिनियर , वकील हमसे दूर भागते है मै बहुत गंदी हूँ और व्यथित भी । स्कूल, कालेजो की फाइलो मे सिमिटी हुयी धूल खा रही हूँ क्योकि मेरा कोई अस्तित्व नही मेरे बच्चो ने मेरा परित्याग कर दिया ।
क्योकि अब मैं बूढ़ी हो गयी हूँ अब तो हमे दिखायी भी नही देता कोई सहारा नही देता हमे । न्याय के कटधरे मे स्वयं मीन की भाँति तड़प रही हूँ, और न्याय माँग रही हूँ क्या आप मुझे न्याय दिलवाओगे आखिर माँ हूँ मै आपकी । भले हाड़-माँस का शरीर हो गया है लेकिन ऊँगली पकड़ना और चलना सिखाया है बेटा याद करो जब बचपन मे लड़खता कर गिर जाते थे तो मै ही वो थी जो मुहँ से अनायास ही निकल जाती थी माँ माँ माँ अब क्यू दूर कर दिया हमे क्योकि मेरे तन से अब बदबू आ रही है, न इसलिए ।
सरकारी दफ्तरों मे स्कूलो में कालेजों मे किताबो की दुनियाँ मे मेरा भले कोई अस्तित्व नही लेकिन इस माँ को दिल मे थोड़ी तो जगह दे दो ।
धूल मे सिमट कर रह लूंगी, बस एक बार गले लगाकर तो देखो, इस माँ के आँखों के आँसु पोछकर कर देखों
कोने मे पड़ी रहूँगी क्योकि हिन्दीं हूँ मैं ।
अब तो लोग धरों मे पार्टियों मे हमे जुबान पर भी नही लाते क्योकि इससे उनका चरित्र खराब हो जायेगा ।
प्लेट मे पड़े जूठन की तरह लोग हमसे कतराने लगे है
स्टेटस सिंबल खराब हो जायेगा ।
मेरी गलती सिर्फ इतनी हैं कि मै कभी गुलाम नही रही
मैं गुलामी की प्रतीक नहीं बन पायी मैं गुलामों की भाषा नही हूँ बस स्वच्छंदता से जीती हूँ यही कसूर हैं न मेरा ।
मैं मजदूरो की भाषा हूँ, गरीबो की भाषा हूँ, हाई क्लास  लोंगो के धर मे जूठन की तरह वासवेसिन मे पड़ी कराह रहीं हूँ ।
क्योकिं अगर उनकें जुबान पर मेरा नाम आ गया तो उनका स्टैंडर्ड खराब हो जायेगा, इमेज खराब हो जायेगी । वर्षो गुलामी की जंजीरों मे जकड़े रहने के कारण अब लोगों की मानसिकता भी गुलाम हो गयीं है।
हमें बोलने वाले लोग भले गरीब है, मजदूर है लेकिन अपनी मातृभूमि की माटी से उनहे प्यार है, उनके संस्कारो मे कोई कमी नही है, मजदूरी कर लेंगें लेकिन गुलामी उन्हे स्वीकार नहीं, शायद इसलिए आज भी उनकों हमसे प्यार है ।
अंग्रेजी के एक शब्द गलत हो जाने पर सभी हो हल्ला मचातें है क्योकि वह अमीरों की भाषा हैं और उसकों पढ़ने वाले हाई क्लास के लोग है ।
हमे कोई तोड़े मरोड़े या हमारी बेइज्जती करें कोई बोलने वाला नहीं हमारी चीखें कोई सुननें वाला नहीं
हमारी अंर्तात्मा विकीर्ण हो जायें किसी को क्या फर्क पड़ता हैं क्योकि मैं हिन्दी हूँ गरीबो की भाषा हूँ, मजदूरों की भाषा हूँ, जमीन से जुड़े लोगो की भाषा हूँ ।
हाँ मैं हिन्दीं हूँ
मैं गुलाम नही हूँ गुलामी की प्रतीक नही हूँ स्वछन्द आकाश मे विचरण करती हूँ । गुलामी और दासता को कभी स्वीकार नही किया क्योकि मैं हिन्दी हूँ
कितनी धूल जमीं हुयी है मुझ पर फाइलों मे सिमटी कब से सड़ रही हूँ, कराह रही हूँ, मेरे बच्चो ने तो मेरा परित्याग कर दिया ।
स्कूलों मे मेरी कोई जगह नही, घरों मे कोई जगह नही दफ्तरों मे कोई जगह नही, संसद मे कोई जगह नही
और तो और अपने बच्चों को खेलते हुए देख रही थी बहुत खुश थी किलकारियों के बीच, लेकिन मेरा बच्चा जैसें ही जमीन पर गिरा दौड़ कर उठा लिया, सोंचा मेरे बच्चे को चोट न लग गयी हो ।  लेकिन यह क्या उसके मुहँ से मेरा एक शब्द भी नही निकला बस माॅम सुनकर मेरी बची आस भी टूट गयीं उस दिन खूब फफक- फफक कर अपने आँचल मे मुँह छुपाकर रोईं थी ।
हाँ मै हिन्दी हूँ आपकी माँ हूँ
क्या आप बचाओगें अपने माँ के अस्तित्व को मै भारत की बेटीं हूँ, मै हिन्दी हूँ ।