चीत्कार - शब्दबाण

शब्दबाण

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Friday, 17 March 2017

चीत्कार

रात के करीब 12 बजे होंगे चारो तरफ सन्नाटा परसा हुआ था खमोशी ने रात को अपने आगोश मे ले लिया था  तभी अचानक किसी के लड़खडाने की आवाज सुनाई देती है मदहोश होकर एक शख्स लगातार अवाज लगाये जा रहा था अरे दरवाजा खोल , ये छिनाल दरवाजा खोल हरिया नशे मे धुत लगातार अपना दरवाजा भड़भडा रहा था बेचारी खुशिया ने डरी सहमी सी दूध पीते बच्चे को छाती से लगा लिया  पास ही सोयी हुयी 5 साल की बच्ची बबली अचानक शोरगुल सुनकर जग गयी और रोने लगी 
अरी कमीनी दरवाजा खोलती क्यू नही अंततः हरिया थकहार कर वही चौखट पर ही सो गया ,सुबह होते ही महौल गमगीन हो गया और चीत्कार से वातावरण गूंजने  लगा हरिया अपने मेहरारु को पीट रहा था , चारो तरफ शोरगुल सुनकर भीड़ इकठ्ठा हो गयी किन्तु किसी ने सामने आकर मदद के लिए हाथ नही बढ़ाया ,तभी अचानक हरिया ने पास जलती हुयी भटटी से लकड़ी निकाल कर खुशिया के हाथ पर रख दिया अचानक एक तड़प एक चीख ने महौल को गमगीन बना दिया ।
हरिया ठाकुर हुकुम सिंह के यहा चाटुकारिता करता रहता था जिससे खाने को दो टुकड़े और शाम को देशी दारु मिल जाती थी यही उसका रोज का काम था टोले का कोई भी आदमी उससे वास्ता नही रखना चाहता था क्योकि हरिया निहायत नीच और कमीना इंसान था मुहँ से हर बात पर गाली के अलावा मेलभाव और भाईचारा जैसे आदर्श उसके संस्कारो मे ही शामिल नही थे ..
काफी रात हो चुकी थी अभी तक हरिया धर नही आया था ,खुशियाँ  खाना किनारे रखकर बिस्तर पर जा पहुची 
और हरिया के आने का इंतजार करने लगी । तभी अचानक हरिया नशे मे धुत होकर लड़खडाता हुआ धर मे प्रवेश करता है अरी ओ छीनाल खाना खाकर खुद आराम फरमा रही है और उसने खुशिया को पीटना शुरु कर दिया बच्चे शोर सुनकर जग गये और अपनी माँ का ये हाल देखकर रोने लगे , यह दृश्य देखकर किसी का भी हद्धय विकीर्ण हो जाये किन्तु हरिया नही रुका आँसुओ की धार खुशिया के गालो को गीला कर रहे थे ,आश्रृधारा के बीच खुशिया का दर्द झलक आया हरिया अपनी मर्दानगी एक निहत्थी औरत पर दिखाकर थोड़ा खाया और थोड़ा गिराया बाकी बचा खाना बाहर नाले मे फेक कर वही लुढ़क गया  , खुशिया वही पड़े एक रोटी के टुकडे को खुद थोडा सा खाकर बबली को खिलाने लगी माँ और बेटी दोनो के आँखो से आसुओ की धारा बह रही थी खुशिया के पेट मे दो दिनो से एक भी निवाला नही गया था वह भूख से तड़प रही थी सिसकी लेते हुए बबली को आँचल मे छुपाकर वही बेसुध होकर सो गयी  , हरिया का यही क्रम लगातार चलता रहा  धर को तंगहाली ने धेर लिया कभी कभी तो हफ्तो धर मे चूल्हा नही जलता था हरिया ने सबकुछ बेचकर दारु मे उड़ा दिया अब वह भी फटेहाल एक धूट देशी दारु के लिए इधर उधर भटकता रहता था धीरे -धीरे समय का पहिया अपनी धुरी पर धूमने लगा बबली अब जवान हो गयी थी , उसकी खूबसूरती और मनमोहक अदाओ ने पूरे मुहल्ले को अपना दिवाना बना दिया था , उसके उरोजो को देखने के लिए रोजाना मुहल्ले के नल पर अवारा लड़को की भीड़ लग जाती थी ,
लेकिन इन सब से बेखबर बबली अपने काम मे मशगूल रहती थी शालीनता की मूर्ती थी वह , बबली के खूबसूरती के चर्चे सुनकर एक दिन ठाकुर हुकुम सिंह उसी मुहल्ले से गुजरा और खुशिया के धर जाकर हरिया को कोसने लगा , ठाकुर ने कहा बहुत निठल्ला है हरिया विटिया अब जवान हो रही है शादी ब्याह भी करना होगा कहाँ से आयेगा ये सब हाहाहाहा खैर खुशिया के जाँघ पर हाथ रखते हुए ठाकुर बोला तुम चिन्ता न करो हम सब देख लेंगे तुम चाहो तो कल से काम पर आ  सकती हो और बबली को भी ले आओ दोनो मिलकर काम करोगी तो विटिया के ब्याह तक जल्दी हो जायेगा बाकी तुम चिन्ता मत करो हम सब देख लेंगे । ठाकुर की ऎसे ओझी हरकत देखकर खुशिया कुछ देर सहम गयी लेकिन बेचारी कर भी क्या सकती थी , भूख प्यास से कब तक तड़पती और उसने काम करने की हामी भर दी, जाल मे आयी मछली को अपनी ओर आता देख ठाकुर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर गयी वह तो सिर्फ बबली के जवानी का रस लेना चाहता था  । और शायद अपने मकसद मे कुछ हद तक कामयाब भी हो गया था , अगले दिन से खुशिया ठाकुर की हवेली काम पर जाने लगी कुछ दिन तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा लेकिन ठाकुर ने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया वह बबली को अपने आस पास ही रखना चाहता था , बबली चाय बना कर ले आ 
जी हुकुम अभी लायी बबली जैसे ही चाय बनाने गयी ठाकुर रसोई मे धुस गया और अनजान बनकर उसकी उरोजो को पीछे से छू लिया , बबली को यह बात नागवार गुजरी लेकिन वह कर भी क्या सकती थी धर जाकर माँ से ठाकुर की बात बतायी 
माँ समझाते हुए बबली ठाकुर तुम्हारे बाप जैसे है उन्होने हम पर कितने उपकार किये है और तू उन पर लांझन लगा रही है गाल पर चाटा रसीद करते हुए चल जा अब दोबारा ऎसी बात मत करना हुकुम ने गलती से छू लिया होगा बबली रोती हुयी अपने दर्द को सह गयी 
अगले दिन फिर से ठाकुर ने खुशिया को खेतो मे काम पर भेज कर ठकुराईन के बाहर जाने का इंतजार करने लगा  , ठाकुराईन के बाहर जाते ही वह रसोई मे आकर हवश मे पूरी तरह बेकाबू होकर बबली के उरोजो को मसलने लगा , बबली को यह बात बिल्कुल नागवार गुजरी और उसने ठाकुर को एक चाटा रसीद कर दिया उस चाटे की गूँज ने पूरी हवेली को गुंजित कर दिया ठाकुर बेकाबू हो गया और उसने बबली के साथ सारी मर्यादाओ को तार तार कर दिया बेचारी मासूम खून से लथपथ दर्द से कराह रही थी , वो चीख रही है लेकिन उस बेदर्द हवेली मे उसकी चित्कार सुनने वाला कोई नही था उसकी चीत्कार ने हवेली को भी रोने के लिए विवश कर दिया सन्नाटा भी अब खामोश हो गया था कपड़े के नाम पर उसके तन पर नाम मात्र कपड़े थे उस मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा था जो ईश्वर ने उसके साथ ऎसा न्याय किया था सिसकती हुयी उस अबला को ठाकुर ने पास के ही झाड़ियो मे फेक दिया , वह कराह रही थी , दर्द से तड़प रही थी लेकिन उसकी चीत्कार किसी को सुनायी नही दे रही थी किसी तरह से वह तन को ढ़कते हुए धर पहुची, खुशिया के देखते ही होश उड़ गये क्या हुआ बबली खुशिया रोती हुयी बोली, बबली क्या हुआ बबली दर्द से कराहते हुए माँ ठाकुर इतना कहते ही माँ बेटी एक दूसरे से लिपटकर रोने लगे आज यह दृश्य देखकर आसमान भी रो पड़ा और धरती भी काँप उठी 
चल बेटी थाने चल नही माँ अब हम मर जायेगें हम अब जीना  नही चाहते नही बेटी थाने चल 
पास के थाने मे जाकर थानेदार से खुशिया रोती हुयी बोली साहब हमारे बेटी का ठाकुर ने बलात्कार किया है 
थानेदार हँसते हुए हाहाहाहाहाहाहाहा 
तुम साली धंधे वाली , रोज का यही काम है तुम जैसो का, 
ठाकुर साहब को बदनाम करती है कितना पैसा लेगी ये सब नाटक करने का 
थानेदार की बात सुनकर खुशिया के ऊपर मानो पहाड़ टूट पडा गिड़गिडाते हुए साहब हम ठाकुर साहब को बदनाम नही कर रहे हम तो बस न्याय माँग रहे है 
ठाकुर काफी रसूख वाला आदमी था थाने मे उसकी तूती बोलती थी लेकिन कानून से हाथ बंधे होने के कारण नाटकीय पूछताछ करने लगा कब हुआ बलात्कार , कैसे किया ठाकुर साहब ने उन्के गुत्ताँग पर कोई निशान हो तो बताओ यह सब सुनकर बबली के आँखो से आँसुओ की धार बह निकली वह एक शब्द भी नही बोल पायी और खुशिया के आँचल मे मुँह छिपाकर सिसकने लगी चल माँ इन दरिन्दो के पास न्याय नही मिलेगा उन्की बाते सुनकर सारा स्टाफ ठहाके लगाकर हँसने लगा ............हाहाहाहाहाहाहा
दोनो माँ बेटी रोते हुए जैसे बाहर आने लगी थानेदार ने रोक लिया बोला आज रात मे इसको यही रुकना पड़ेगा पूछताछ होगा नही माँ चल धर मै यहा नही रुकूँगी खुशिया रोते हुए नही बेटी तू अकेली नही है मै बाहर बैटी हू तुम यही रिक जाओ उस दरिन्दे को सजा मिलनी चाहिए बबली सहमी हुयी रुकने के लिए सहमत हो गयी 
रात मे थानेदार चल इसको लाकप मे लेकर चल, 
लाकप मे थानेदार ने बबली को हवश की नजर से देखना शुरु किया बबली ने थानेदार के मंशा को भाप कर भागने की कोशिश करने लगी लेकिन हवश और नशे मे चूर इन दरिन्दो के पास से भागना शायद मुमकिन ही नही था थानेदार ने बबली के उरोजो को मसलना शुरु कर दिया एक तरफ हवश और दूसरी तरफ मासूम की चीखे सुनायी दे रही थी अभी वह संभल भी नही पायी थी कि एक और हमले ने उसको बेसुध कर दिया दर्द की अब इन्तहा हो गयी थी खून से लथपथ कराहता शरीर रुह से जुदा हो जाना चाहता था । आसुओ ने पूरे महौल को गमगीन कर दिया था लेकिन उन हवश के पुजारियो को उस मासूम की चित्कार नही सुनायी दे रही थी बारी बारी से सभी ने अपनी प्यास बुझायी और उसे वही तड़पता छोड़ दिया बाहर एक माँ अपनी बेटी की सलामती की दुआ कर रही थी , उसकी आँखे उस दरिन्दे को सजा दिलाने के लिए पथरा गयी थी रात भर खुशिया पल्लू मे मुह छिपायी रोती रही , कल न्याय मिल जायेगा लेकिन उसे क्या पता था कि यहाँ पूरा समाज दरिन्दा है , बेटियाँ सिर्फ हवश को पूरा करने का संसाधन मात्र है , गरीब की यहा सुनता कौन है 
सुबह होते होते उस मासूम की साँसे थम गयी थी , उसके चीत्कार की अवाजे  थाने की चारदीवारी मे दफन हो गयी थी अब न कोई उसकी पीड़ा थी न कोई दर्द न कोई शिकवा क्योकि अब उसकी चीत्कार सुनने वाला कोई नही था  , उसकी चीत्कारे भी साँसो के साथ थम गयी ।



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