चीरहरण - शब्दबाण

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Thursday, 16 March 2017

चीरहरण

नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धांत एंव व्यवहार राजनिति कहलाती है ,अधिक संकीर्ण रुप से देखा जाये तो ,शासन सत्ता प्रात्त करना या शासन मे पद प्रात्त करना ही राजनिति है । राजनिति समाज के संगठित जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्रियाकलाप है ,सामान्यतः यदि हम राजनैतिक दृष्टिकोण से पर दृष्टिपात करे तो पायेंगे कि राजनैतिक चिंतन के बिना राष्ट्र निर्माण एंव विकास संभव ही नही है , भारत देश का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है ,और यहाँ चुनाव को पर्व के रुप मे मनाया जाता है ,लोकतंत्र को हम मंदिर भी मान सकते है ,किसी भी देश का यदि लोकतंत्र व राजनिति ही लकवाग्रस्त हो तो ऎसे मे राष्ट्र के विकास की परिकल्पना करना भी मूर्खता होगी । भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है ,ऎसे मे भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र मे राजनितिक दलो के पनपने के लिए पर्यात्त रुप से उर्वराशाक्ति एंव पर्यावरण विघमान है ,परिणामस्वरुप आजादी के बाद भारत मे राजनितिक दलो की बाढ़ सी  गयी है ,नये नये दलो के बनने टूटने का क्रम लगातार जारी रहता है । जिससे सैकड़ो राजनितिक दल भारत के राजनैतिक पटल पर अन्तःक्रिया करते रहते है , भारत मे आजादी के उपरान्त कुछ वर्षो तक कांग्रेस का अधिपत्य रहा है ,किन्तु कुछ ही अंतराल के बाद क्षेत्रीय दलो ने एकदलीए प्रणाली को चुनौती देना शुरु कर दिया  ऎसे मे तमिलनाड़ु ,आन्ध्रा ,बिहार जैसे राज्यो से सैकड़ो जनप्रतिनिधि चुने जाने लगे धीर धीरे राष्ट्रीय दल इन्की काँति मे तेजहीन होने लगे । आजादी के उपरान्त 1951 मे (रामराज्य परिषद), (1942 मे( द्रविड़ मुनेत्रकड़गम ), भारतीय लोकदल (1974) जनसंघ (1986) जनता दल (1970), आदि सैकड़ो की संख्या मे राजनितिक दल प्रकाश मे आये । किन्तु भारतीय राजनिति मे लोकतंत्र का आभाव रहा है , नेता राष्ट्र के लिए राजनिति न करके स्वार्थ और सत्ता के लिए राजनिति कर रहे है ,जो लोकतंत्र को मरणासन्न स्थिति मे ले जायेगी अनेको दल त्यक्ति एंव व्यक्तिव पर आधारित है इनमे प्रमुख उत्तर प्रदेश मे समाजवादी पार्टी एंव बहुजन समाज पार्टी है जो व्यक्ति विशेष एंव जाति समुदाय आधारित तुष्टिकरण की राजनिति कर रही है , राजनितिक दलो मे स्वार्थ एंव गुटबंदी की सत्तापरक राजनिति बिभिषिका का रुप धार कर रही है ,उत्तर प्रदेश मे एक माह तक चला सुरसंग्राम इसका सटीक उदाहरण है , । आज राजनिति की परिभाषा तुष्टिकरण ,जाति आधारित राजनिति ,भ्रष्टाचार और असभ्य भाषा के प्रयोग करने मात्र रह गयी है  , अभी हाल मे संपन्न हुए पाँच राज्यो के विधानसभा चुनाओ के परिणामो ने सभी दलो को एक बार पुनः राजनिति की परिभाषा को बदलने एंव चिंतन करने पर विवश कर दिया है  , 2014  के लोकसभा चुनावो के बाद राजनिति मे असभ्य और अमर्यादित भाषा के प्रयोग मे क्रांतिकारी अभ्युदय हुआ है , किसी भी नेता के भाषण की शुरुआत विकास   , जनता की मूलभूत सुविधाओ राष्ट्र के विकास से इतर गधे एंव आतंकवादी ,खूनी , तथा चोर से होती है । खैर कोई बात नही परिणामो ने बता दिया है कि जनता को  अब गधे मे कोई खास रुचि नही है ,उसे मुफ्त का चंदन , धिस मेरे नंदन जैसी पंक्तियो से कोई लेना देना नही है , जनता ने गधे का माँफ कर दिया है और गधो पर राजनिति करने वालो को पूरी तरह साँफ कर दिया है , यह जनता का जनादेश है ,उसे अब लैपटाप, स्मार्टफोन , साड़ी और मुफ्त की विजली पानी मे कोई खास रुचि नही रही अब जनता को रोजगार ,विकास और सबल राष्ट्र चाहिए समृद्ध एंव अपने पैरो पर खड़ा देश चाहिए न कि सोने की वैशाखी पर चलने वाला अपाहिज देश । राजनितिक दलो के सत्ता लोध के कारण शून्य राजनितिक संस्कृति का विकास हो रहा था जिसे जनता ने पूरी तरह खारिज कर दिया , फिर भी बहुमत पाने के लिए आज भी राजनितिक दल विभाजन एंव खरीद फरोक्त मे कदा्पि पीछे नही है ,जिसने गठबंधन की राजनिति को जन्म दिया है , दलीय अनुशासन मे कमी होने से जहाँ सरकार चलाने मे बाधा  रही है वही भ्रष्टाचार जैसी दुष्प्रवृतिया जनता के मानस को उद्धेलित कर रही थी । जिसका परिणाम आप लोगो के समक्ष है , भ्रष्टाचार और और कालेधन जैसे मुद्दे आज भी राष्ट्र मे पटल पर है , सभी राजनितिक दलो ने देश की एकता अखंड़ता को विधटित करने का ही कार्य किया है , आज कोई भी राजनैतिक दल भ्रष्टाचार से अछूता नही है , चाहे बोफर्स धोटाला हो , चारा धोटाला हो , व्यापम धोटाला हो या 2 जी स्पेक्ट्रम धोटाला । लोकतंत्र का गला धोटते राजनेताओ की बयानबाजी तो फिर ठीक थी किन्तु ईवीएम और देश की स्वयतता प्रात्त संस्था चुनाव आयोग पर दोषारोपण करके न सिर्फ राजनिति की मर्यादाओ को तार तार किया है अपितु भारतीय संविधान की पवित्रता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है अब तो लोकतंत्र स्वयं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ा रहा है

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