राजनीति का विकेन्द्रीकरण, लोकतंत्र बनाम लूटतंत्र - शब्दबाण

शब्दबाण

सकारात्मकता का संदेशवाहक सबसे तेज ! सबसे आगे !

Thursday, 16 March 2017

राजनीति का विकेन्द्रीकरण, लोकतंत्र बनाम लूटतंत्र




आजादी के पूर्व राजनीति लोकतंत्र की आत्मा कही जाती थी। आजादी के उपरान्त भी राजनिति के द्वारा देश की दिशा एंव धारा तय की जाती रही है, सरदार बल्लभ पटेल जैसे राजनितिज्ञों ने देश की 567 रियासतों को संगठित करके देश का श्रृ़ंगार किया। वही राष्ट्र की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर अब्दुल हामिद भारत  के आँचल को कभी गंदा न करने का संकल्प धारण करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी एंव नेता जी सुभाषचंन्द्र बोस, जिन्होने शासन सत्ता का लोभ त्यागकर माँ भारती की एकता एंव अखंडता को सारगर्भित बनाये रखने के लिए सतत् प्रयास किया एंव अपने प्राणों की आहुति दे दी।
आखिर ऐसा क्यो है कि सदियाँ बीत जाने के बाद भी आज देश का हर एक नन्हा सिपाही उन्के आश्रृपूरित भाव भरी श्रद्धांज्जलि देने के लिए तत्पर्य रहता है, अरसे गुजर जाने के बाद भी आज उन्की स्मृतियाँ हमारे हद्धय को आन्दोलित करती रहती है एवं सदैव राष्ट्र के लिए प्राण न्यौछावर करने की प्रेरणा देती रहती है,  उन्के पद्चिन्हों पर चलकर राष्ट्र को पुनः विश्वगुरु बनानें की परिकल्पनाओं को धरातल पर लाया जा सकता है। भारत में लोकतंत्र एक पहेली से कम नही है - विशेषकर भारत के लिए एक ओर जनसंख्या की दृष्टि से दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने में भारत का प्रत्येक पढ़ा लिखा नागरिक, प्रबुद्धजन गर्व महसूस करता है, देश के आजाद होने के बाद जो संविधान बना और उसके बाद 67  वर्ष गुजर जाने के बाद भी लोकतंत्र टिका रहा, उस समय भी भारतवासियों को अपने संविधान और लोकतंत्र पर गर्व था, आज भी है ।
भारत में _1984 में एक बार लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक लगाकर आपातकाल लागू किया गया था, तो भारत की जनता ने मौका मिलते ही उसे भारी बहुमत से अस्वीकार कर दिया था। दूसरी ओर भारत के सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनियां की सबसे बड़ी गरीब, कुपोषित और अशिक्षित आबादी निवास करती है, इस मायनें में भारत का लोकतंत्र पूरी तरह असफल है। आजादी व लोकतंत्र के आधी सदी से भी अधिक गुजर जाने के बाद भी जाति, लिंग, वर्ण, क्षेत्र और समुदायों की राजनीतिक विषमताएं बढ़ी एंव मजबूत हुयी है।
ये खाईयां और दरारें इतनी बढ़ गयी है कि पूरा राष्ट्र टूटता हुआ नजर आ रहा है, नीचे स्तर की घूसखोरी से लेकर ऊपर के महाघोटालों तक भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है, भारत की राजनीति और यहा के राजनितिज्ञ दलबदल, अनैतिकता ,सिद्धान्तहीनता व अवसरवाद के मूर्त रुप नजर आते है। राजनीति में अपराधी तत्वों, हिंसा कालेधन, जाति, व संप्रदायिकता का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है ,अब तो देश की संप्रभुता और आजादी को राजनितिज्ञों ने दावँ पर लगा दिया है, ऐसा क्यों क्या हमारे लोकतंत्र के बनावट में ही कोई बुनियादी खोट है या मामला कुछ और ही है।