यह है, देशभक्ति का कंपल्सरी डोज - शब्दबाण

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Tuesday, 7 March 2017

यह है, देशभक्ति का कंपल्सरी डोज


उन्हे फिल्मे देखने के लिए मौसम के मिजाज जैसी शर्ते लागू टाइप्ड,चीजो की खास परवाह नही है बस जेब मे पैसे वाली वांछनीय और गर्लफ्रैण्ड की डिमांड वाली अधिमानी अहर्ता होनी चाहिए कालेज से छुटटी पाने के लिए वो अपनी दादी को काल्पनिक मौत मारने के लिए हमेशा तैयार रहते है ,सनीलियोनी की फिल्मो के वह धनधोर प्रशंसक रहे है, वह भी जब कोई उन्मुक्त होकर अपना काम दिखाता हो उन्के लिए प्रेम और त्याग भी बहुत बड़ी चीज है इसी दर्शन के प्रदर्शन मे वह अब तक प्रेम मे एक दर्जन से ज्यादा लड़कियो का त्याग -परित्याग कर चुके है ,हिन्दुस्तान मे बस उन्का शरीर ही बसता है क्योकि दुर्भाग्य से वो यहा पैदा हो गये उन्का बस चलता तो अपना जन्म स्थान अमेरिका मे शिफ्ट कर देते ।

आज फिर जीने की तमंत्रा है वाली स्टाइल मे ज्यादातर वह पीने की कोशिश मे ही रहते है ,उन्के लिए शराब पीना उतना ही जरुरी है जितना की आईसीयू मे भर्ती मरीज के लिए आक्सीजन , सिगरेट पीने के इतने शौकीन है कि सिगरेट पर लिखी चेतावनी स्वास्थय के लिए सिगरेट पीना  हानिकारक है  वाली चेतावनी से भी मनमानी करने से बाज नही आते इतने सारे सदगुणो से युक्त होने के बावजूद जनाब उबते नही है , बल्कि शराब पीकर जमीन मे लोटने से अपने "डाउन टू अर्थ" होने का परिचय देते है चरित्र भले छात्र वाला न हो लेकिन छात्र नेता कहलाने के लिए उन्के पास कालेज के हर कोने मे उन्के सदगुणो से युक्त पोस्टर जरुर दिखायी पड़ जाते है ,उनके लिए युवा कर्मठ और जुझारु वाले विश्लेषण एकदम फिट बैठते है युवा तो वह इस कदर है कि युवावस्था मे पहुचते ही मुहल्ले की सारी लड़कियो की स्कैनिंग कर डाली थी ,आज भी अपनी युवावस्था को साबित करने के लिए दिन भर मे दो चार लड़कियो से सैंडिल खा ही लेते है कर्मठता मे तो उनका कोई सानी नही है ,एकदम यूनिक स्टाइल के कर्मठ है मोहल्ले की हर होली दीवाली और रतजगा के लिए चंदा वसूली जैसा दुरुह कार्य इन्ही के जिम्मे किया जाता है अगर बात की जाये उन्के जुझारुपन की तो शायद ही मुहल्ले का कोई ऎसा धर हो जिन्से छोटी छोटी बात पर जूते न खाये हो अब वह सदगुण संपन्न के बाद भी नेतागिरी मे न आये ऎसी नाइंसाफी वह समाज के साथ नही कर सकते ,खैर आज उन्का कार्यक्रम फिल्म देखने का कम और और गर्लफ्रैंड के साथ साइड सीट की कार्नर पर बैठने का ज्यादा बन चुका था ,माॅ की दवाई खरीदने के लिए मिले पैसे से लेकर उन्की गर्लफ्रैंड का मूड सबकुछ अनुकूल था ,योजनानुसार बहाने के लिए उन्होने दादी को मारा फिर उन्के अन्तिम संस्कार के लिए कालेज से सिनेमाहाल रुपी कब्रिस्तान के लिए निकल लिए उन्की दुनिया एक अदद गर्लफ्रैंड सिनेमाहाल के टिकट और पापकार्न के बकेट की प्रात्ति तक ही सीमित हो गयी थी, रास्ते भर वह अपनी गर्लफ्रैंड को बाइक पर बिठाये उडली उडलाई ऊ करते चले जा रहे थे ,इन प्रतिक्रिया के फलस्वरुप वह अपनी माँ की दवाई लाना भूल चुके थे ,कालेज के कीमती लेक्चर को गोली मार चुके थे और अपनी दादी को समय से पहले ही स्वर्ग पहुचा चुके थे रास्ते मे उन्होने एक कुत्ते को लातमारकर अपनी गर्लफ्रैंड को अपनी बहादुरी से परिचित कराया बाइक के सामने अचानक आये बच्चे के माँ बहन की स्तुति बंदना की फिल्म के टिकट लेने के लिए लाइन मे लगी महिला को जमीन मे गिरने से बचाने के लिए अपने शरीर से सहारा देते रहे ,फिल्म का टिकट मिलते ही उन्की गर्लफ्रैंड उनके और नजदीक आ गयी ,परदे की फिल्म और बाहर की फिल्म दोनो शुरु होने वाली थी लेकिन उससे पहले राष्ट्रगान का आवाहन हो गया ,सनीलियोनी की फिल्म के पहले राष्ट्रगान होता देख जनाब सोचने लगे चलो अच्छा हुआ दिनभर जो भी प्रक्रिया रही उनमे देहभक्ति के साथ राष्ट्रभक्ति जुड़ गयी ।


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