हमारी कोलकाता यात्रा भाग-1 - शब्दबाण

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Saturday, 25 March 2017

हमारी कोलकाता यात्रा भाग-1

                         अनंत चेतना का सफर

भाव भूमिका

भावों की अतल गहराई लिए हम इस यात्रा पर जा रहे थे। यही वह वंग भूमि है जिसने हर तरह की विभूतियों से इस भारतभूमि को धन्य किया है और विश्व को अजस्र अनुदान देकर मानवता को कृतार्थ किया है। साहित्य हो या कला, फिल्म हो या स्वतंत्रता संग्राम -हर क्षेत्र में इसके विशिष्ट योगदान रहे हैं, और सर्वोपरि धर्म-अध्यात्म क्षेत्र में तो इसका कोई सानी नहीं। श्रीरामकृष्ण परमहंस-स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, स्वामी प्रण्वानन्द, कुलदानंद व्रह्मचारी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी विशुद्धानंद, महायोगी श्री अरविंद, सुभाषचंद्र बोस, रविंद्रनाथ टैगोर, विपिन चंद्र पाल,....इस वीर प्रसुता दिव्य भूमि, इस तीर्थ क्षेत्र को देखने के गहरे भाव के साथ यात्रा शुरु हो चुकी थी। सोशल इंटर्नशिप तो एक बहाना मात्र था , लेकिन इसमें भी हम एक विद्यार्थी के ज्ञान पिपासु भाव के साथ अपने विषय क्षेत्र के नए आयामों को जानने व अनुभूति करने के भाव के साथ जा रहे थे। 

हरिद्धार स्टेशन से ही नयी अनुभूति

यू तो हमने कोलकाता जाने से पहले, अन्य राज्यों का भ्रमण किया है जिसमें 2007 में हमारी मुंबई की यात्रा आज भी हमारे जेहन मे बसी हुयी है।  किन्तु कोलकाता की यात्रा हमारे मन में अलग ही रोमांच और उमंगे पैदा कर रही थी।  स्टेशन पहुचतें ही मन मे अलग जोश और उत्साह हिलोरे लेने लगी, बस दिल यही कर रहा था कि कितनी जल्दी बस हम अपनी मंजिल पर पहुँच जाये। कोलकाता का जेहन बार-बार हमारे अन्तः करण को उद्धेलित कर रहा था,  वहाँ के लोग कैसे होंगे वहाँ का खान-पान कैसा होगा, लोगों का व्यवहार कैसा होगा जैसी अनेकों अनुभूतिया हमारे जेहन में बार बार उथल-पुथल मचा रही थी,  यू तो मैनें बहुतों से सुन रखा था कि कोलकाता क्रान्तिकारियों की भूमि है और यहाँ का प्रमुख त्यौहार दुर्गापूजा समग्रराष्ट्र में धूमधाम से मनाया जाता है।  इन्ही विचारों के प्रवाह के मध्य दून एक्सप्रेस के पटरियों से प्रेमालाप ने हमारी तन्ननिद्रा को भंग कर दिया।

दून का सफर

हरिद्धार स्टेशन पर ठीक 10:30 मिनट पर दून एक्सप्रेस दहाड़ी हुयी आ पहुची एक बात तो मै बताना ही भूल गया हमारे साथ कुछ मित्र भी उसी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे जो अलग कम्पार्टमेंट मे यात्रा कर रहे थे हमारी ट्रेन में, मैं और हमारे दो मित्र हिमाँशु और दीपक पोखरियाल थे , हम तीन ट्रेन मे सवार होकर ट्रेन के वलने की प्रतिक्षा करने लगे कुछ ही पलों में ट्रेन ने द्रुत गाति पकड़ ली और पटरियों पर दौड़ लगाना शुरु कर दिया, लखनऊ तक तो ठीक थी इसके बाद दून का सफर काफी बोझिल लगने लगा हम साथ में ले गये मुर्रे का स्वाद लेने लगे 12 बजने को हो आये थे। सारे यात्री अब धीरे -धीरे वित्राम की मुद्रा में जाने लगें।  हमने भी साथ ले गये पूड़ी सब्जी का आनन्द लेकर सोने की मुद्रा में जाने का प्रयत्न करने लगे,  साथ में गये मित्रों का कुशल क्षेम जानने के लिए फोन से किया गया हर प्रयास हमे जिम्मेदारी का अहसास करवाता रहा। नेटवर्क की महिमा भी स्पष्ट दिखायी देने लगी, वैसे भी कहते है बीएस एन एल अपने बाप का भी नही होता। सोचा था थोड़ा नेट का प्रयोग कर बाहरी दुनियाँ से भी संपर्क कर ले , लेकिन यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी , दून जैसे ट्रेन मे लग्जरी लाइफ की परिकल्पना कर करवटे लेने लगा।
अपर वर्थ होने की वजह से डिग्री आफ फ्रीडम की भावना सीमित रही ऊपर से दून का आदिम ढा़चा कालकोठरी का अहसास करवाता रहा। रही सही कसर फोन ने पूरी कर दी वो भी हमारी तरह तन्ननिद्रा मे चला गया चार्जिंग का साकेट ढूढ़ते हुए इस आदिम ढा़चे को और नजदीक से देखने का अवसर प्राप्त हुआ। अब बाहरी दुनिया के दोस्तों से संपर्क कट चुका था। और थक हार कर हम भी निकल लिये अपनी चेतना की यात्रा पर और एक स्वप्निल दुनिया में।

वनारस की सुबह
 
सुबह 3:30 के आसपास हम वनारस पहुचे ट्रेन लगभग अपने निर्धारित समय से 5 धंटे विलम्ब हो चुकी थी वनारस की सुवह बहुत खास होती है कहाँ जाता है अवध-ए-शाम और वनारस -ए -सुबह भगवान भोले की नगरी में पहुचतें ही कुछ आध्यात्मिकता भी महसूस हुयी यहाँ का बनारसी पान और भाँग काफी प्रसिद्ध है।
कुछ बनारसी बाबू मुँह लाल किये अपने खास अंदाज में डिब्बें में आ धमके उनसे बातचीत के दौरान ही पता चला कि वनारसी पान का दुनियाँ में कोई सानी नहीं वनारसी अंदाज में काफी अदब भी दिखायी पड़ा।

बंगाली परिवार से परिचय 

पहले दिन तक तो सभी अपने अपने कार्य मे व्यस्त रहे किसी ने किसी का भी कुशलक्षेम जानने का प्रयास नही किया ऎसा लग रहा था मानो सब दूसरे ग्रह से या अन्यत्र गोले से आये है जहाँ बातचीत करने की परंपरा नहीं है।
खैर कहते है पानी की महिमा अपरम्पार है, बिछड़े हुए को भी मिला दे। मैं जैसे ही अपनी बोतल लेकर आगे की ओर बढ़ा अचानक एक मंगलग्रह की आवाज ने हमको चौका दिया, वह आंटी बंगाली में हमसे पानी लाने का आग्रह कर रही थी, खैर शब्दों को तो नही समझ पाया लेकिन भावनाओं को समझ गया।
इसी पानी के सिलसिले ने जलधारा के समान विचारों के प्रवाह को तेज कर दिया। अन्ततः हमारी बातचीत शुरु हो गयी एक बूढ़े चाचा ने बताया कि कोलकाता का पारंपरिक व्यंजन मछी-भात है। और कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली,  साइंस सिटी, बेलूर मठ जैसे रमणीय जगह है। जो विश्व मे अपना अलग स्थान रखती है।
चाचा जी के प्यार और स्नेह ने हमें साहस प्रदान किया उन्होनें बातों ही बातों में कहा कि बेटा अगर पहली बार कोलकाता जा रहे हो तो सावधान रहना।  शायद हमारी मनोदशा ने ही हमारे पहली बार जाने के भावों को ब्यान कर दिया।

हरियाली और गाँवों की सोंधी खुश्बू
 
धीर -धीरे ट्रेन अपनी मंजिल की ओर बढ़ चली, हम अपनी मंजिल के और करीब आते गये चारों तरफ बिखरी किरणमयी हरियाली  हमारे मन को असीम शान्ति की ओर ले जाने लगी, हर तरफ केले के पेड़, नारियल के सघन पेड़ और तालाब-तलैय्या दिखनी लगी शायद इसलिए भी कोलकाता को तलाब का शहर कहा जाता है। वर्धमान आते-आते लगभग आधी ट्रेन खाली हो गयी थी कुछ एक आध यात्री ही बैठे हुए अपनी मंजिल आने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन हमारी मंजिल अभी दूर थी।


हावड़ा का यादगार पल

ट्रेन वर्धमान से लगभग दो धण्टे बाद वर्धमान से हावड़ा पहुची, हावडा़ का नाम सुनते ही मन में सिहरन उठने लगी पैरों में जैसे पंख लग गये।हावड़ा सेतु को देखने के लिए उत्सुकता काफी बढ़ गयी थी लेकिन अभी भी हमारी मंजिल दूर थी हमे नरेन्द्रनगर जाना था ट्रेन दूसरे  दिन सुबह 7 बजे के बजाये रात में 7:30 पर पहुची इससे आप अंदाजा लगा सकते है कि दून अपने निर्धारित समय से 12 धण्टे देरी से थी। लेकिन हावड़ा स्टेशन पर पडते हुए पहले पगों ने सारी थकावट और चिन्ता दूर कर दी, हमनें हावडा सेतु को देखने और सेल्फी लेने का विचार पहले ही मन में बना लिया था। स्टेशन तक आते वाहनो ने हमे आश्चर्य चकित कर दिया। शायद हावड़ा स्टेशन का यही आखिरी छोर था। हम
बाहर निकल कर बने भव्य स्टेशन को निहारने लगे अग्रेजों के कलीन भव्य भवनों को बनाने में कितनी खूबसूरत आर्कटेक्ट का प्रयोग किया गया था। वास्तव में हम अंग्रेजों‌ के कुछ मामलों में बहुत ऋणी है।
बाहर पीले रंग की टैक्सियाँ शान्तिकुंज की याद दिला रही थी वही गंगा छोर से ओला-ऊबर जैसी सुविधायें पर्यटकों को मुसीबत से ऊबारने का कार्य बाखूबी कर रही थी। हावड़ा सेतू को देखते ही मैं अपने तीनों मित्रों के साथ सेल्फी लेने से रोक नही पाया, यह हमारे कोलकाता आगमन की पहली सेल्फी थी । जो स्मरण करा रही थी कि हम ऎतिहासिक नगर कोलकाता में पर्दापण कर चुके है। बस में बैठे- बैठे हावड़ा सेतु के कला को देखकर लगा यह तो कलाकर की कला का अनुपम उदाहरण है। और पुनः से अग्रेजों को ऋणी भाव से धन्यवाद दिया।
 

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