चंचल - शब्दबाण

शब्दबाण

A blog about new idea, command men issue, motivational and many more article in hindi

test banner

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Thursday, 1 December 2016

चंचल

             

  परिन्दों को मिलेगी मंजिल एक दिन ये फैले हुए उनके पर बोलते है    
  खामोस रहते है अक्सर वही लोग जमाने मे जिनके हुनर बोलते है

मन मे उत्कंठाओ का ज्वर कल्पवित हो रहा था ,शनैः शनैः मस्तिष्क पूर ब्रहामांण्ड की परक्रमा करते हुए किसी एक बिन्दु  पर आकर केन्द्रित हो गया ,कि कोई युवा आज के आधुनिक युग मे ऎसा कैसे कर सकता है, आज का आधुनिक युवा ऎसी परिकल्पना भी नही कर सकता है जो आज इस युवा ने कर दिखाया था ।पैरो मे ऎसे पंख लग गये जैसे हम किसी रहस्यमयी दुनिया मे आकर किसी अदृश्य शाक्ति को खोज रहे है, किन्तु उस रहस्यमयी दुनिया के रहस्य को सिर्फ मै ही नही पूरा समाज जानना चाहता था । हम तन्नमुद्रा मे यू ही किसी रहस्य की तलाश मे खोये हुए थे कि अचानक किसी दोस्त ने आवाज दी चंचल सूर्यवंशी आ गया कुछ ही पलों मे मेरी तन्ननिद्रा भंग हो गयी और मै अतीत से वर्तमान मे आ गया यही से शुरू होती है कभी न खत्म होनी वाली उस युवक की संधर्षगाथा ।आज का आधुनिक युवा अपने सांस्कृतिक मूल्यो एंव अपनी संस्कृति को स्वयं विरंजित कर रहा है । आज का आधुनिक युवा जहाँ आज भोग विलास मे लिप्त है एंव पाश्चात्य सभ्यता मे गूढ होता जा रहा है वही इस युवा ने भोग के स्थान पर योग को अपनाकर न सिर्फ योग के क्षेत्र मे प्रतिष्ठित शीर्षाशन मे लगातार 134 मिनट शीर्षाशन लगाकर विश्वकीर्तमान स्थापित किया है ।वही योग साधना को अपने जीवन मे आत्मसात कर पैराणिक संस्कृति एंव ऋषि परम्परा को पुनः अवतरित करने का प्रयास किया है ।

चंचल सूर्यवंशी हरिद्धार के देवसंस्कृति विश्वविधालय मे योग मे अध्ययनरत है, चंचल ने यहा कि दिव्यता को आत्मसात कर गुरुकुलपरम्परा को आगे बढाया है ।देवसंस्कृति विश्वविधालय के दिव्यवातावरण मे कुलपिता के त्यार और स्नेह ने नवनिर्माण की परिपाटी अद्घृत की है ।इस तरह की गुरु परंपरा को आगे बढ़ाने का जो प्रण है वह इस दिव्यवातावरण की परिणीत है  ।इस कहानी मे कोरी कल्पना ही नही उस युवक की कहानी है, जो न सिर्फ समाज का दर्पण है अपितु आधुनिक युवा का प्रेरणा स्रोत है ।
30 अप्रैल 1994 मुल्ताई, बैतूल (मप्र) मे एक किसान दंपति गणपति सूर्यवंशी एंव ग्यारसी देवी के धर जन्मा यह बालक बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा का धनी था । चंचल सूर्यवंशी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा -दीक्षा अपने मामा नरायन खंडयित ग्राम कोपरा तहसील आठनेर से प्रात्त की ।मामा के स्नेह प्यार और प्रोत्साहन ने इस बालक को हमेशा कुछ अलग करने की ओर प्रेरित किया ।बचपन मे अनेको कठिनाईयों के बाद भी मामा के स्नेह ने सारी कठिनाईयों को धूमिल कर दिया ।बचपन से ही पढ़ाई मे औसत रहने के बाद भी किसी रहस्यमय खोज ने हमेशा आगे नूतन पथ पर बढ़ने  के क्रम को जारी रखा चंचल की प्रतिभा का आकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस उम्र मे बच्चे अपने माँ के स्नेहरुपी आँचल मे लिपटे रहते है, उस उम्र मे इस बालक को किसी ऎसी शक्ति की तलाश थी जो आज हम सभी के सामने विश्वकिर्तिमान के रुप मे है ।

बचपन मे ही 70-80 किग्रा वजन सिर पर उठाकर इस बालक ने सारे समाज को हतप्रभ कर दिया, कहानी सुनते हुए कई बार मै वर्तमान से अतीत मे खो गया ऎसा लगा मानो हम स्वयं किसी अनसुलझे रहस्य मे उलझते जा रहे है ।चंचल की एक धटना ने हमारे रोम -रोम को रोमंचित कर दिया ऎसा लगा कि यह बालक सिर्फ हम युवाओं का प्रेरणा स्रोत ही नही है अपितु मानवीयता आज भी समाज मे विघमान है ,बचपन मे किसी महिला का बच्चा कुएँ मे गिर गया था ,चारो तरफ चित्कार सुनकर चंचल भी उस स्थल पर जा पहुचाँ किन्तु सभी के मना करने के बाद भी यह युवक बिना एक पल गवाये कुएँ मे कूद गया, वह कुआ अत्यन्त प्राचीन होने के साथ -साथ बिषधरो का धर भी था ,किन्तु इस बालक ने उस बच्चे की जान बचाकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और समाज को एक सीख भी दी कि कैसे अपने मानवीय मूल्यो की रक्षा की जाती है ,इस धटना ने समाज को सोचने पर विवश कर दिया ।

तभी मुझे ऎसा प्रतीत हुआ कुछ तो है इस बालक मे जो अब रहस्य न होकर इसकी प्रतिभा है, चंचल सूर्यवंशी के शीर्षाशन का सफर शतरंज की शह और मात से शुरु हुआ था । चंचल शतरंज का माहिर खिलाडी है और अपने मस्तिष्क को केन्द्रित करने के किए शीर्षाशन किया करता था ,क्योकि शीर्षाशन योग की वह विधा है जो न सिर्फ शरीर मे रक्त संचार संतुलित करने मे सहायक है, अपितु मस्तिष्क के ऊर्जा को भी केन्द्रित करता है । आनलाइन शतरंज मे भी चंचल अन्तराष्ट्रीय स्तर पर शतरंज खेलता है ,शतरंज मे चैपियन बनने की जिद ने इस युवक को ऎसे पथ पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से सिर्फ शीर्ष ही नही आसन भी दिखता है, शीर्षाशन मे शीर्ष पर पहुचने के बाद भी चंचल को लगता है उसकी मंजिल कोई और है लगातार अथक प्रयास एंव अभ्यास ने इस युवक को शतरंज के खेल मे भले ही शह -मात मे उल्झा दिया किन्तु शीर्षाशन के  शीर्ष पर अवश्य पहुचा  दिया है, आज ऎसे युवा हमारे सिर्फ प्रेरणा स्त्रोत ही नही  है, अपितु पूरे समाज का दर्पण है  जिन्से प्रेरणा लेकर हम असम्भव को भी सम्भव कर सकते है और अपने ऋषि परंपरम्परा को पुनः धरा पर अवतरित कर सकते है ।
हमे तो वह गूढ़ रहस्य मिल गया अब शायद आपको भी उस रहस्यमयी दुनिया का रहस्य पता चल गया होगा 

Post Bottom Ad

Responsive Ads Here