एक दीपक राष्ट्र एंव नन्हे मुन्नें दीपकों के नाम - शब्दबाण

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Saturday, 29 October 2016

एक दीपक राष्ट्र एंव नन्हे मुन्नें दीपकों के नाम

सभी मित्रो को दीपोत्सव पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
सितम्बर माह समाप्त होते ही त्यौहारों की सौंधी खुश्बू बाजारो मे महसूस की जा सकती हैं । सर्दियों  के आगमन के साथ त्यौहारों का आगमन हो जाता है ।नवम्बर मास के कार्तिक पूर्णिमा को मनायी जानी वाली दीपो के पर्व दीपावली का हिन्दू धर्म मे विशेष महत्व है ।  पन्द्रह दिन पहले ही साफ सफाई और रंग रोगन से दीवाली के आगमन का अनुमान लगाया जा सकता है ,इस दिन लोग नये वस्त्र धारण करते है पूरे देश दीपो के प्रकाश से प्रकाशित हो जाता है धरो मे दीपक की श्रृंख्ला दिखायी देती है ।रात मे माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना करके  माँ के चरणों मे चन्दन, पुष्प, फल और नैवेघ अर्पित करके पूरे वर्ष धन -धान्य एंव समृद्धि की कामना करते है । किन्तु इन सब के मध्य एक बात समझ से परे है कि क्या पुष्प और नैवेघ  अपर्ण से ही माँ  लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है शायद नही ईश्वर स्वयं सर्वशक्तिमान है उसे आपके पुष्प और फल की कामना नही है , वह तो चाहता है आप मानव धर्म के दायित्व का निर्वहन करते हुए समस्त विश्व का कल्याण करे । गीता मे श्री कृष्ण भगवान ने कहा है सर्वे भवन्तु सुखिना सर्वे अन्तिम निरामया अर्थात सभी सुखी हो सभी निरोगी हो
किन्तु यह तभी सम्भव है जब हम अपने राष्ट्र के प्रति एंव समाज के प्रति अपने कर्तव्यो का निर्वहन करेंगे ।आज के आधुनिक परिवेश मे  हमारे समाज के साथ ही रिश्तों और त्यौहारों के मायने बदल गये है आधुनिकता के मैराथन मे हर कोई अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने मे लगे है ।जो सबसे महँगे वस्त्र धारण करेगा करोड़ो रुपयों के बारुद और फुलझड़ी फोडेगा वही श्रेष्ठ और पूँजीपति कहलायेगा । किन्तु इन्हे कौन समझाए कि व्यक्ति श्रेष्ठ वस्त्रो से नही अपितु आत्म परिष्कार और ज्ञान से होता है ज्ञानी पुरुष ही श्रेष्ठ माना जाता है अज्ञानता और अपने स्वार्थी प्रवृत की वजह से हम अपनी खुशियो के लिए दूसरो की खुशी मे व्यवधान उत्पन्न कर देते है गोला बारुद से न सिर्फ हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है अपितु इससे पशु -पक्षियों को कितना विरह का सामना करना पड़ता है यह विचार हमारे अन्तर्मन ने आता ही नही । दीवाली मे लाखो धर दीपक के उजाले से रौशन तो हो जाते है ,लेकिन उब मासूमो के बारे मे कोई नही सोचता है जो एक अदद दिये के प्रकाश के लिए दर दर भटकते रहते है । स्टेशनो पर, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनो पर भीख मांगने वाले वह बच्चे, अंधकार मे डूबा वह धर जिसके धर का दीपक ही कही खो गया है, अंधकार मे दूसरो के पटाखो की धनक से ही खुश हो जाने वाले मासूम जिन्हे  दीपक के प्रकाश की और पटाखो की तलाश होती है वह दीपक होटलो मे रेस्तरां के जूठे बर्तनों मे अपनी खुशी तलाश रहे होते है, रात को खुले आसमान मे ठुठरते हुए बुजुर्ग को दीपको की तलाश होती है जो अपने प्रकाश से उन्हे गर्माहट दे सके ।अनाथ आश्रमो मे अनाथ बच्चे जिनको माँ बाप का प्यार तो नही मिला किन्तु उनको भी एक ऎसे दीपक की तलाश होती है जो अपने प्रकाश से उनके जीवन मे नवांकुरण करके प्रकाश और खुशियां ला सके  । हमारे पास गोला, बारुद और फुलझड़ी जलाकर खुशी पाने के अलावा  और भी विकल्प है एक बार इन दीपको के जीवन मे दीप जलाकर तो देखो आपार खुशी मिलेगी, और धर मे माँ लक्ष्मी के साथ सुख -समृद्धि का भी वास होगा इस दीवाली आओ मिलकर संकल्प ले एक दीपक उन मासूम दीपको और राष्ट्र के नाम प्रज्ज्वलित करेंगे  जो भविष्य मे राष्ट्र को अपनी ज्योति के माध्यम से नवगति प्रदान करेंगे एंव राष्ट्र के भविष्य निर्माता और प्रकाश स्तम्भ बनेंगे इसलिए एक दीप राष्ट्र और मासूम दीपको के नाम अपने मनुष्य धर्म का पालन करे ।


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