बुधिया - शब्दबाण

शब्दबाण

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Monday, 3 October 2016

बुधिया



गांव मे चारो तरफ चहल पहल का
महौल था बच्चे स्कूल जाने के लिए इधर उधर सड़को पर बैग लिए भाग रहे थे कुछ किसान हल लिए अपने खेतो की ओर भागे जा रहे थे ऎसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा गांव बिकास के पहिए के साथ धूम रहा है थोड़ी दूरी पर बुधिया का फूसनुमा धर था सामान अस्त व्यस्त विस्तर के नाम पर मैला कुचैला गलीचा बुधिया के दरिद्रता की कहानी बता रहा था पास पडी टूटी चारपाई पर बुधिया के काका हुक्का गुडगूडाते हुए हाड़ माँस का शरीर लिए भीँख मे मिली जिन्दगी गुजारते हुए अपने दिन गिन रहे थे
इन सब बातो से बेखबर बुधिया अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी की तरह साइकिल पर गठ्ठर लादने मे मशगूल था तभी काँपते स्वर मे काका की आवाज आयी अरे वो
बुधि धि बुधिया आज बाजार नही जायेगा धर मे खाने के लाले पड़े है निकम्मा कही का बुधिया आवाज को अनसुनी करके अपने काम मे व्यस्त था जैसे ही बुधिया ने साइकिल पर पैर रखा एक जानी पहचानी आवाज ने फिर से उसके कदमो को ठहरने के लिए विवश कर दिया वो गुड्डी की आवाज थी। गुड्डी बुधिया की मेहरारु थी अभी दोनो की शादी हुए पाँच वर्ष हुए थे गोद मे बच्चा दूध के लिए रो रहा था । गुड्डी ने मध्यम स्वर मे कहा बच्चा कब से रो रहा है धर मे दुध लाने के पैसे नही है। कल से एक निवाला मुँह को नही गया है कुछ पैसे होते तो बच्चे के दूध का कुछ इंतजाम हो जाता बुधिया ने फटे हुए मैले कुर्ते मे हाथ डालकर टटोला पैसे के नाम पर फूटी कौड़ि भी हाथ न आयी वह निराश होकर बाजार की तरफ निकल पड़ा । बाजार पहुंचते ही चारो तरफ गहमा गहमी का महौल दिख रहा था
बाजार मे चहक पहल देखकर बुधिया की आँखे चमक उठी सभी दुकानदार अपनी अपनी जगह सुनिश्चित करने मे मगन थे बुधिया ने भी जगह
देखकर अपनी दुकान लगा दी। रात होने को आ गयी सुबह से शाम तक उसकी एक भी साड़ी नही बिकी । सारे दुकानदार अपना सामान सहेजकर अपने गंतव्य की ओर जाने लगे बुधिया भी निराश होकर अपने गंतव्य की ओर चल निकला निराशा के भाव साफ चेहरे पर दिखायी दे रहे थे , रह रह कर बच्चे के रोने की आवाज उसे विहल किये जा रही थी । रात काफी हो चली थी रास्ता बीहड़ और जंगलो से भरा था रास्ते मे जंगली जानवरो और चोर डाकुओ का खतरा था । बुधिया ने वही कही  गाँव मे शरण लेने की सोची थोड़ी दूर जाकर एक गांव दिखायी दिया अन्तिम छोर पर एक टूटी फूटी झोपड़ी मे कुछ प्रकाश दिख रहा था पास पहुंचकर देखा एक ड़िबरी अपने मध्यम प्रकाश से वातावरण को चाँदनी रात की तरह प्रकाशमान बना रही थी। थोड़ी दूरी पर बुधिया साइकिल खड़ी करके टोह लेने लगा झोपड़ी से किसी के कराहने की आवाज आ रही थी करुण वेदना सुनकर बुधिया का हद्धय भी वेदना से पीड़ित हो गया वह अपने को अन्दर जाने से रोक नही सका  ; अन्दर जाकर देखा एक वृद्धा टूटी चरपाई पर ज्वर से पीड़ित करुणा वेदना मे मछली की भाँति तड़प रही थी यह दृश्य देखकर उसका हद्धय विकल हो उठा वृद्धा के पास जाकर बुधिया बोला माता जी आपको तो तेज ज्वर है वृद्धा को किसी के
करीब होने का अहसास होते ही उसने तुरन्त आवाज रामू तू आ गया बेटा मुझे पता था तू अपनी माँ को छोड़कर नही जायेगा इतना कहते हुए वृद्धा के आँखो मे आँसू आ गये  बुधिया के आँखो से भी आश्रूधारा बह निकली अपने आपको सम्भालते हुए बुधिया बोला माता जी मै हूँ बुधिया।
पानी माँगते हुए वृद्धा ने अपनी आपबीती कह सुनायी दो जवान बेटे अपनी पत्नी के साथ ससुराल मे रहते है छोटा बेटा रामू माँ के इलाज के लिए परदेश कमाने गया हुआ था सब कुछ होते भी वह अनाथ  थी यह सब सुनकर बुधिया अनायास ही अपने आँसुओ को नही रोक पाया वह रात भर वृद्धा के सिरहने बैठ कर सेवा करता रहा सुबह आशीर्वाद लेकर अपने गंतव्य की ओर चल निकला उसके चेहरे पर आभामंडल की तरह तेज दिखायी दे रहा था चेहरे पर मुस्कान और संतुष्टि के भाव साँफ दिखायी दे रही थे। क्योकि आज उसने दुनिया का सबसे बेशकीमती धन कमा लिया था ।
परोपकारः परमो धर्मः इंसान पैसे तो बहुत कमा लेता है लेकिन संतुष्टि नही बुधिया ने आज जो
संतुष्टि रुपी धन कमाया था वह सिर्फ परोपकार से कमाया जा सकता है ।

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