दीपकों से प्रेरणा लेकर सवाँरे अपना कल - शब्दबाण

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Friday, 28 October 2016

दीपकों से प्रेरणा लेकर सवाँरे अपना कल

सभी मित्रो को दीपो के महापर्व दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ
त्वं ज्योतिस्त्वं रविशचन्द्रो विघुदग्निश्च तारकाः ।
सर्वेषां ज्योतिषाँ ज्योर्ति दर्पोवल्यै नमो नमः  ॥


दीप स्वयं जलकर हमारे जीवन को प्रकाशित कर तिमिर का समूल नाश करता है न कोई स्वार्थ न कोई द्वेष दूसरों के उज्जवल भविष्य के लिए जलता है। इसलिए हमे मनुष्य धर्म निभाते हुए अपने आने वाले कल के लिए जलना सीखना चाहिए। ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी प्रकाशवान रह सके।
दीपों के महापर्व ने एक बार फिर दस्तक दे दी है, साथ ही शीत ऋतु का भी आगमन हो गया है । यू तो इस पर्व को लेकर अनेकों कथाएँ प्रचलित है कहा जाता है आज ही के दिन भगवान श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या वापस आये थे। इसलिए दीवाली का पर्व मनाया जाता है किन्तु एक बात विचारणीय है कि क्या उस समय भी ऐसी ही अतिशबाजी हुयी होगी शायद नही फिर हम क्यू अतिशबाजी में अपने पर्यावरण और धन का दोहन कर रहे है। आज आधुनिकता के युग में हमारे सारे पर्व त्यौहार आधुनिक हो गये है, इस पाश्चात्य शैली के मैराथन में मतान्ध होकर हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों और विरासतों को भूल गये है, इस होड़ में हम स्वयं अपने आने वाली पीढियों के लिए काल का जाल बिछाने में लगे है । हम यह क्यों नही समझ पाते है कि यह यूरोपियन, चाइनीज और अमेरिकन देशों की चाल है जो अपने धटिया सामान हमारे बाजारो मे बेचने के लिए हम भोले भाले भारतवंसियो को गुमराह कर रहे है। आज पूरे भारत के बाजार चाइना की लाइटें और फुलझडी ,पटाखों से भरी पडी है क्या चाइनीज हमसे ज्यादा हमारे त्यौहारों के महत्व को जानते या समझते है , शायद नही किन्तु अपने माल को बेचने के लिए हमारे त्यौहारों और सांस्कृतिक मूल्यों का समूल नाश कर रहे है आज त्यौहारों की प्रासंगिता बदल गयी है आधुनिक समाज में आधुनिकता का चादर ओढ़े मनुष्य बुद्धि विकीर्ण होकर अपने को अधिक सभ्य और पूँजीपति साबित करने में लगा है दीपावली का शाब्दिक अर्थ है दीपों वाली दीवाली फिर ये फुलझडी पटाखे और गोला बारुद कहा से आ गयी दीपो का पता नही उसकी जगह सिर्फ रंगी बिरंगी चाइनीज लाइटे दिखायी दे रही है। मैं ये नही कहता आप किसी का बहिष्कार करो किन्तु अपने पर्वों की पवित्रता और मूल्यों की आत्मा को तो जीवित रखो त्यौहारों के बदलते सर्वभौमिकता ने हमारे पर्यावरण का ही दोहन किया है। हमारे समाज द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण की वजह से प्रकृति हमसे रुष्ट हो गयी है जो कुछ चल रहा है उसे देखकर लगता है कि वह अगले दिन अपने आपे से बाहर होकर अपना क्रोध व्यक्त करेगी अदृश्य जगत में चल रही गतिविधियों का पर्यवेक्षण करने वालो का कथन है कि वातावरण का तापमान ग्रीन हाउस गैसों की वजह से बढ़ रहा है। यही क्रम चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब धुव्रों की बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी और समुद्र के पानी की सतह मीटरों ऊपर उठ जायेगी ,जिससे समुद्र तट पर बसे नगरों तथा नीचे बसे भू-भागों में इतना पानी भर जायेगा ,जिससे वर्तमान आबादी और संपदा का बेचा भू -भाग उस विपत्ति के गर्भ मे समा जायेगा। वातावरण में क्लोरों फ्युओरों कार्बन और कार्बन डाई आक्साइड जैसी जहरीली गैसों की मात्रा को देखते हुए वैज्ञानिको ने यह आशंका व्यक्त की है कि अगामी दस वर्ष में जलवायु प्रलयकारी रुप धारण करेगी। कैसर ,श्वास रोग, हद्धय रोग जैसी धारक बीमारियाँ इसी की परिणीत है। आकँडे बताते है इन दिनों प्रतिवर्ष वातावरण मे एक पी.पी.एम की दर से कार्बनडाई -आक्साइड भरती जा रही है इस मात्र मे, 30% की अभिवृद्धि पृथ्वी के तापक्रम को चार डिग्री सेंटीग्रेड तक बेचा देती है। तापक्रम में यह वृद्घि प्रतिबर्ष ग्रीन हाऊस प्रभाव को जन्म देती है। इन सबका जिम्मेदार स्वयं हमारा समाज और मनुष्य है वैदिक काल में भी दीवाली मानयी जाती थी वह दीवाली त्यौहारों के मूल्यों की रक्षा करने वाली थी लोग पंद्रह दिन पहले ही दीवाली का इंतजार करते थे धर की साज सज्जा के साथ साथ हर गली चौराहों, नुक्कडों पर हस्त निर्मित मिट्टी के दीपक दुकानों की शोभा बढ़ाते थे। लोग अपने धरों में सिर्फ मिट्टी के दीप जलाते थे। इसके दो फायदे थे एक पारंपरिक दुकानदारों के दीपक बिकने से उन्का व्यसाय चलता रहता था ,तथा उन्ही पैसों से उनके धर में भी  खुशी के दीप जलते थे दूसरा वैज्ञानिक कारण है मिट्टी कार्बनडाइ -आक्साइड का सबसे बडा अवशोषक है और अक्सीजन उत्कल्पित करता है दीपज जलाने से मनुष्य आरोग्य होता है और समृद्घि आती है दीपक मे पाँचों तत्व मिट्टी,आकाश,जल ,अग्नि,वायु सभी पाये जाते है। जिससे सृष्टि का उद्गमन हुआ है और दीवाली के बाद भी दीपक बच्चों के खेलने के काम आता है। बचपन में हर किसी ने तराजु बनाये होंगे इसलिए बच्चो को दे अपना बचपन और आने वाला कल चाइनीज माल नो गारंटी ।

शुभम् करोति कल्याणाम् अरोग्यं धनसंपदा।
शुत्रवुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमस्तुते।।

इतने महत्वपूर्ण तथ्यों को जानकर कृप्या अपने धरो में मिट्टी के दीपक जलाये अपने आने वाली पीढ़ी को दे उज्ज्वल भविष्य और स्वच्छ पर्यावरण ताकि हम ले सके खुले में श्वास और त्यौहारों की सर्वभौमिकता बनी रही।