बेटियाँ वेश्या है या समाज की सोच ....? - शब्दबाण

शब्दबाण

A blog about new idea, command men issue, motivational and many more article in hindi

test banner

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Wednesday, 21 September 2016

बेटियाँ वेश्या है या समाज की सोच ....?



समाज का आईना सभी मित्रो से एंव बहनो से अनुरोध है एक बार अवश्य पढ़े ! पोस्ट बढ़ी है समय अवश्य लगेगा किन्तु यर्थाथ सत्य है पोस्ट मे किसी धर्म या नारी के मर्यादा  की निजता का उलंधन नही किया गया है, किसी शब्द का प्रयोग अनादर सूँचक नही है !  भारत वैसे तो विभिन्न संस्कृतियो का देश है हमारी  संस्कृति एंव परम्परा विश्व मे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है ! इसलिए भारत अनादि काल से  अध्यात्मिक दृष्टिकोण के लिए सदैव विश्वगुरु एंव विश्व का मार्गदर्शक रहा है ! यहाँ अतिथि देवो भव यत्र रमन्ते नारी तत्र पूज्यते देवता अर्थात जहाँ नारी पूज्यनीय है वहाँ देवता का निवास है ! किन्तु हमारे समाज ने इन धारणाओ को बदलकर रख दिया है ! समाज मे हो रहे बालात्कार भ्रूणहत्या जैसे कृत्य  नारी की निजता का न सिर्फ हनन कर रहे है ! अपितु देश की सार्वभौमिक धारणाओ को परिवर्तित कर रहे है ! क्या यही जगत गुरु भारत है या हमारी संस्कृति जहाँ किसी महर्षि के अस्थियो से वज्र बनाया जाता था ! जिस देश के महापुरुषो की अस्थिया एंव राख भी मातृभूमि के रक्षा की गौरवगाथा का बखान करते थे ! आज के सन्त महत्माओ के बयान न सिर्फ नारी के वर्चस्व की निन्दा  करते है अपितु समाज की भृकुटि भी पुरुष प्रधान हो गयी है जहाँ ! नारियो की वेशभूषा जींन्स पहनना स्कर्ट पहनना लड़को को वहशीपन का निमंत्रण देना है ! मै पूछता हूँ क्यू क्या यह अधिकार सिर्फ लड़को को है ! लड़की रात मे बाहर निकले तो वह गलत लड़की किसी से हसँकर बात कर ले तो वह गलत  ! लड़के करे तो सही लड़को का शराब पीना जन्मसिद्ध अधिकार है लड़की पी ले तो वेश्या लड़कियो को अपनी खुशी रोकर बयाँ करना चाहिए क्योकि हस देगी तो वह निमंत्रण दे रही है ! सड़को पर रोड़ पर चौराहो पर नजरे गढ़ा कर चले क्योकि सिर उठा दिया तो वह वेश्या है ! लड़की पैदा होना अपराध है बीबी या महिला मित्र बनाना नही लड़की पढ़ाओ मत लड़की की इज्जत मत करो  त्रिया चरित्रम दैवो न जानम जैसे जुम्ले लिखे गये है लेकिन वही त्रिया जिसका चरित्र देवता नही जानते वही देवताओ को जन्म देने वाली है श्रृष्टि को रचने वाली है वही माँ दुर्गा है वही काली है ! एक माँ की व्यथा समाज के लिए :-

उसके पैदा होने पर ख़ुशी कम थी। आखिर वो एक लड़की थी।
घरवालों ने चाहा था बेटा, लेकिन बेटी हो गई। समाज ने उस
समय भी किये थे उस पर अत्याचार लेकिन वो नादान थी
हँसती । माँ के आँचल पर चैन से सोती वो नन्ही सी परी आज
बड़ी हो गई। आज भी समाज उसको रोज़ तकलीफ़ देता है, पर
अब उसकी "हँसी" कहीं छुप सी गई है। और यह बात सिर्फ एक
"माँ" समझती है। तभी तो आज एक माँ दर्द भरी आवाज़ में
समाज को चीख-चीख कर कह रही है। हाँ! मेरी बेटी वेश्या है,
और मुझे उस पर नाज़ है।
अजीब विडंबना है इस देश की यहाँ एक तरफ़ तो नारी को
"दुर्गा" का अवतार माना जाता है। उनकी पूजा की जाती
है। वहीं दूसरी ओर उनका अपमान करने में भी कोई पीछे नहीं
रहता। कब तक ऐसे ही "निर्भया" की बलि चढ़ती रहेगी? कब
तक? यहाँ निर्भया के दुःख पर साथ देने वाले बहुत हैं। लेकिन
निर्भया को अपनाने वाला कोई नहीं। क्यों कोई उस समाज
का हिस्सा बनना चाहेगा जहाँ स्त्री और पुरुष को समानता
की नज़र से नहीं देखा जाता हो? मैं ऐसे समाज और लोगों का
बहिष्कार करता हूँ, जहाँ नारी के मानवीय अधिकारों की
अवहेलना की जाती है।
आज एक माँ का दर्द आपसे बयाँ कर रहा हूँ। वो माँ जो 9
महीने तक कोख में अपने बच्चे को पालती है। बिना भेदभाव
किये, बिना जाने की वो लड़का है या लड़की। वो माँ जो
अपने बच्चों की खुशियों के लिए खुद की खुशियों को भी
कुर्बान कर देती है। लेकिन आज वो माँ दुखी है और नाराज़
भी। जब भी उसकी बेटी घर से बाहर निकलती है। हर बार
उसको समाज का सामना करना पड़ता है। लेकिन इस बार वो
समाज से हार गई है। और कह रही है कि,
हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है। क्योंकि वो आज़ाद है।
खुले गगन में उड़ती है बिना परवाह किए,
ना सोचती है ना समझती है समाज के यह झूठे नियम,
क्योंकि वो सच्ची है, अक्ल की थोड़ी सी कच्ची है
शायद अभी भी वो बच्ची है।
वो पहनेगी जो उसे पसंद है।
समाज की परवाह किये बिना।
वो घूमेगी रात में जब तक उसका मन हो,
बेड़ियो के बंधन में कहाँ वो बंधने वाली।
तुम उसको घूरना मत भूलना,
उसको छेड़ना मत भूलना,
वो इस समाज की "वेश्या" है,
उसको वैश्या कहना मत भूलना।
तुम्हारी जुबान पर जो आये उसे वो कहने से मत चूकना,
क्योंकि वो ना डरेगी अब, ना रुकेगी अब,
वो आज़ाद है सिर्फ उड़ेगी अब।
तुम क्या कहना चाहते हो वो मैं खुद कह देती हूँ,
आज मेरी बेटी का दुःख भी तुमसे कह देती हूँ।
नहीं निकलना चाहती वो घर से,
डरती है वो इस समाज से, इसकी कोरी-झूठी शान से।
मर्द सर तान के जाते हैं चकलों पर
वो गलियों में भी सर झुका के चलती है।
क्योंकि वो एक लड़की है।
कपड़ों से कैसे कोई किसी का चरित्र जान सकता है,
सूट पहने हैवान भी मैंने देखे है।
रोज़ करती है वो इन सबका सामना,
क्योंकि वो इस पुरुषवादी समाज की नज़र में "वेश्या" है,
हाँ ! वो वेश्या है, वो वेश्या थी और शायद वेश्या हीरहेगी।
वो कहाँ कभी एक स्त्री थी, वो कहाँ कभी एक इंसानथी,
लेकिन एक बार तो आईने के सामने खड़े होकर
अपनी अंतर्रात्मा से ज़रूर पूछना,
"क्या वो सच में वेश्या है?"
खुद के गुनाहों की सजा उस पर ना थोपना,
कभी अपनी नज़र से भी तो एक बार पूछ कर देखना
तुम कमजोर हो लेकिन वो नहीं,
इसलिए तो मैं कह रही हूँ इस समाज से,
हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है।
हाँ ! वो कल किसी की बहू भी होगी,
और उसको भी उस पर नाज़ होगा,
वो मिसाल बनेगी इस समाज की
क्योंकि वो आज़ाद है , क्योंकि वो आबाद है।
हाँ ! मेरी बेटी वेश्या है और मुझे उस पर नाज़ है।



Post Bottom Ad

Responsive Ads Here