पप्पू का हार्ड हो गया फेल - शब्दबाण

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Saturday, 17 September 2016

पप्पू का हार्ड हो गया फेल


कहानी है दो पथविमुक्त युवाओ की
कैसे आज के आधुनिक युवा कुरीती एंव व्यसन मे लिप्त होकर समाज और राष्ट्र का दोहन कर रहे है साथ ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यो और अपने अमूल्य काया का भी दोहन रहे है

सारे युवा कुरीतियो से खेल रहे है
और कैंसर की मार बगल वाले झेल रहे है
पप्पू और कल्लू ने मिलकर खेला क्रिकेट का खेल
पप्पू की साँसे फूली कल्लू का हार्ड हो गया फेल
जब पढ़ने पढ़ाने कि बारी थी जब  पढ़ने पढ़ाने कि बारी थी
तब मयखाने मे पैग चल रहे थे रेलमठेल
देखौ कैसे दिन आये धर धर बेचत है सरसो के तेल
कैंसर की देखो मार अब बचे की नही है कौनो आस
खेती बारी सब बिक गयी
एकौ पैसा नही बचा कलुआ के बप्पा के पास
कलुआ कै बप्पा
लड़की के जन्म पर नाक भौ सिकोड़त रहे बार बार
अब जब बहु नाही मिल रही भटकत है द्धार द्धार
दहेज प्रथा के देखो हाल
जब शादी हुयी दहेज लिहिन ट्रक भराय
मेहरारू से जब पानी मगिन मेहरारू कोने मा खडी गुरार्य
कल्लू भैया अनपढ़ रहे
कहिन मेहरारु से ली हिसाब जोड़ाय
मेहरारु उठी पाँच मे से दस दिहिस धटाय
कल्लुआ के बप्पा कहिन दत तेरी की
पढ़ावत पढ़ावत पाथर होय गये
लिखावत लिखावत कपड़ा गये
सब फाट
कुम्हारन लड़का पढ़ गये सोलह दूनी आठ 
जब हम कहित रहे बीड़ी चिलम पीना नाही होत है सही
हमारौ कहा नही माने
अब अब गाँव गाँव चिल्लात है लेव दही लेव दही लेव दही॥