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Sunday, 8 May 2016

आधुनिक युवा एंव भारत के आधुनिक महाभारत का समाधान :यज्ञ

जिन्दा मानव बम एंव वासना मे मतान्ध होकर, धूम रहे युवा अपनी अज्ञानता से किसका भक्षण कर ले, किसी को नही पता । खुली आँखों से तबाही का मंजर देखने वाले धृतराष्ट्र भारत का ये आधुनिक महाभारत कब खत्म होगा । आज का भाव संवेदनाओं के अकाल में लगता है, हमारे वो श्रवण कुमार कही खो गये है जो अपने माता- पिता को अपने कंधे पर कावंड में‌ बिठाकर उन्की इच्छा पूर्ती हेतू ले जाया करते थे । कावंड तो आज भी लाखो उठाये जाते है, किन्तु उन्मे सिर्फ कामनाओं का जल भरा होता है । न जाने वो भाव संवेदनाएँ कहा खो गयी है जो माता पिता को तृप्ति प्रदान करती थी । माँ गायत्री ,भारत माता ,और यज्ञ भगवान भारतीय संस्कृति के माता - पिता है । जन -जन उन्की अवमानना हुयी हैं तभी तो कलियुग का द्धार खुला है ,और यह द्धार खुलने से ही समाज में आशंति एंव विग्रह का वातावरण बन हुआ है । पथ भ्रष्ट युवाओं का सही मार्गदर्शन करके आज समाज में ऎसे श्रवण कुमार अवतरित करने की अवश्यकता महसूस हो रही है जो अपनी सकारात्मक ऊर्जा का सदुप्रयोग करके विचार क्रांति की मशाल को कंधे पर बिठाकर सकारात्मक ऊर्जा के प्रकाश पुंज को धर -धर पहुंचा सके । भारत का ही नही अपितु समग्र विश्व का कल्याण सकारात्मक विचारधारा एंव यज्ञ के माध्यम से ही संभव है । यज्ञ का शाब्दिक अर्थ ही है त्याग, बलिदान, शुभ-कर्म एंव एकता ,अपने प्रिय खाद्य पदार्थो एंव मूल्यवान सुगंधित और पौष्टिक द्रब्यो का अग्नि एंव वायु के माध्यम से समस्त विश्व के कल्याण हेतू वितरित किया जाता है । यज्ञ के तीन अर्थ है-: १-देवपूजा, २-दान ,३- संगतिकरण,  आज के आधुनिक एंव बिलासता पूर्ण जीवन मे मनुष्य भोग -विलास मे इतना लिप्त हो गया है, कि न उसे संस्कति की चिन्ता है, न सद्-आचरण की न ही राष्ट्र की । आज प्रकृति का दोहन करने में समग्र राष्ट्र ही नही अपितु समग्र विश्व लगा हुआ है ।
उन्हे यह ज्ञात नही है कि वह पतन कि ओर कितनी तेजी से अग्रसर हो रहे है । समग्र विश्व एंव पथ भ्रष्ट युवाओ को पथ भ्रष्ट होने से बचाने के लिए देवपूजा की अनिवार्यता प्रतीत हो रही है, यज्ञ का मुख्य उद्देश्य जनमानस को सत्य प्रायोजन के लिए संगठित करना है। इस युग मे "संघे शाक्ति कलियुगे " का मंत्र अचूक है।
परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए प्रजापति ने उसकी पृथ्क-पृथ्क शक्तियों का एककीकरण करके संधे शाक्ति के रुप मे माँ दुर्गा का प्रदुभाव किया था, उसके माध्यम से ही देवताओ को पुनः विजय की प्रात्ति हुयी थी । मानव जीवन की समस्या का हल सामूहिक शक्ति एंव संघबद्धता, पर निर्भर है एकाकी -त्यक्तिवादी असंगठित लोग दुर्बल और स्वार्थी माने जाते है,  अतः आज समस्त युवाओं को संगठित होने की अवश्यकता है, भोग बिलासिता के जीवन का परित्याग करके बहुमूल्य जीवन का सदुप्रयोग विश्वकल्याण एंव राष्ट्रकल्याण एंव समाज कल्याण के लिए करे।

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