मातृत्व दिवस , या पतन की ओर - शब्दबाण

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Sunday, 8 May 2016

मातृत्व दिवस , या पतन की ओर


माँ हमेशा खाली डिब्बे को बन्द करके दिखाकर कहती थी बेटा तू पेट भरकर खा ले मेरी रोटिया इस डिब्बे में रखी है मै बाद में खा लूगी.......मैं भी आधी रोटी खाकर कह देता था मेरा पेट भर गया ....उस मातृत्व की ममता को आज हम सिर्फ एक दिन के लिए सीमित कर रहे है समझ में नही आ रहा है हम अपनी माँ के मातृत्व का कर्ज अदा कर रहे है या माँ का। बचपन से आज तक कंकरीट के रास्ते पर चलते चलते कितनी ठोकरे खायी है, कोई सम्भालने वाला नही था एक दिन माँ के साथ उसी रास्ते पर निकला और पैरो में ठोकर लग गयी, माँ ने अपने हद्धय के टुकडे को सीने से लगा लिया, और हमारी दर्द की कराह में पहली बार माँ के आँखों में शीप में रखे मोती के समान आश्रु की ओस रुपी बूँदे निकलते देखा, बचपन में जब कभी कोई तकलीफे आयी सर्वप्रथम माँ के नयनो को आश्रुपूरित होते देखा है । सागर की गहराई को नापना आसान है किन्तु माँ के मातृत्व में सागर से भी अगाध गहराई जिसे नापने के लिए न वैज्ञानिक ने कोई उपकरण बनाने मे आज तक सफलता पायी है न ही करुणा निधान ..........ने। पुत्र कितना भी बडा हो जाये माँ के लिए हमेशा वही छोटा बच्चा रहेगा जो कभी ठोकरे खा- खा कर बडा हुआ है , माँ आज भी अपनी ममता की आँचल से हमे ढ़क कर मातृत्व की वर्षा कर देती है।.....उस लिए प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल, प्यार का दिवस होता है हमेशा अपने प्रेम की बर्षा मे सराबोर करती रहती है । आज हम ठोकरे खा-खा कर इतना बड़े हो गये की उस माँ की ममता को एक दिन के लिए सीमित कर रहे है .......8 मई मातृत्व दिवस बाकी के दिवस अपनी महिला मित्र और अर्धांगनी के लिए अब माँ की ममता की छाँव मे वो शीतलता कहा जो महिला मित्र और अर्धांगनी के प्रेम में है .........कुसूर हमारा भी नहीं है हम पाश्चात्तय सभ्यता के मैराथन की अंध दौड में अश्व की भाँति दौड रहे हैं मातृत्व के प्रेम की चिन्ता कहाँ है, चिन्ता तो इस बात की है कि कही कोई इस दौड़ में हमसे आगे न निकल जाये जो छल कपट दिखावा हमारे प्रेम में है वह माँ कि ममता में नही है। इसलिए माँ का हर दिवस पुत्र दिवस होता है, पुत्र के लिए असीम प्रेम का दिवस होता है । हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति विलुप्त होती जा रही है, वेलेंटाइन दिवस, पिता दिवस, चाकलेट दिवस न जाने कौन कौन से दिवस के बाद मातृत्व दिवस हम आखिर कब समझ पायेंगे कि हम पतन की ओर अग्रसर हो रहे है। हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता का पाश्चात्यीकरण हो रहा है जाति धर्म सम्प्रदाय को बाटने के बाद सिर्फ एक ही चीज हैं‌ जिसे कभी बाँटा नही जा सकता वो है माँ का प्रेम है जिसमे आज सफलता प्रात्त कर ली गयी है ऎसा प्रतीत हो रहा है हम पतन की ओर अग्रसर हो रहे है, ये सब विदेशी कंपनियो के आकडों का खेल हैं जिसमे हम इतना उलझते जा रहे है जिससे निकट भविष्य में निकलना शायद मुश्किल हो जाये कंपनिया अपनी GDP बढ़ा रही है और हम अपनी माँ कि ममता को नीलाम करके मातृत्व का सरेबाजार ढिंढोरा पीट रहे है। जिस तरह महिला मित्र के प्रेम को पाने के लिए हजारों कीमती उपहार देते हो उसी तरह माँ की ममता की गहराई को नापना है तो कभी माँ के हद्धय से लगकर पूछना माँ आपको क्या उपहार चाहिए अपना मातृत्व और असीम प्यार अजीवन देने के लिए आपको जवाब मिल जायेगा माँ का प्रेम सिर्फ एक दिवस के लिए है या हर क्षण जीने के लिए है।

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