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Friday, 20 May 2016

युवाओं के भविष्य का राजनीतिकरण-: वर्तमान शिक्षा प्रणाली


शिक्षा के लिए ज्ञान, प्रबोध, तथा विनय शब्दों का प्रयोग किया गया है। प्राचीन काल के ग्रंथों में अशिक्षित मनुष्य को "विधा विहीन पशु " कहा गया है, शिक्षा प्रकाश का स्त्रोत है।
शिक्षा का मूल उद्देश्य आदर्शवादी,चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के विकास का निर्माण करने के साथ साथ राष्ट्र तथा समाज के विकास के प्रति अभिवृत्ति विकसित करने पर होना चाहिए।
चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व का विकास नागरिक तथा सामाजिक कर्तव्यो का पालन सामाजिक कुशलता की अभिवृद्धि एवं राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार शिक्षा का मूल उद्देश्य सदैव रहा हैं।  देश की आजाद़ी के उपरान्त 1947 से लेकर आज तक भारतीय शिक्षा को उद्देश्यहीनों की उद्देश्यहीन शिक्षा के नाम से अभीहित किया जाये तो अव्युक्ति नहीं होनी चाहिए।

हमारे समक्ष देश का मानचित्र स्पष्ट नहीं है। देश का निर्माण बाँध बनाने, कल कारखानें,  स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया लाने से नही होता है अपितु शिक्षा के माध्यम से होता है आज के समय में शिक्षा के क्षेत्र में जो विकृतियाँ दिखायी दे रही है उनका कारण है शिक्षा के प्रति सरकार की उदासीनता एंव उद्देश्य हीनता है

शिक्षा के दृष्टिकोण से सरकार के उदासीन रवैय पर एक नजर-:
विद्यालयों की कमी (भारत में लगभग 6 लाख स्कूल के कमरों की कमी है)
स्कूल में शौचालय आदि की कमी
जातिवाद (भारत में एक मुद्दा है)
गरीबी (अधिक जनसंख्या के कारण या अधिक जनसंख्या के कारण साक्षरता में कमी)
जागरूकता की कमी
आज़ादी के समय भारत की साक्षरता दर  (12%) प्रतिशत थी जो बढ़ कर लगभग (74%) प्रतिशत हो गयी है।  परन्तु अब भी भारत संसार के सामान्य दर (85%) से बहुत पीछे है। 
भारत में संसार की सबसे अधिक अनपढ़ जनसंख्या निवास करती है। वर्तमान स्थिति कुछ इस प्रकार है: • पुरुष साक्षरता:  (82%) • स्त्री साक्षरता:  (65%) • सर्वाधिक साक्षरता दर (राज्य): केरल (94%) • न्यूनतम साक्षरता दर (राज्य): बिहार (64%) • सर्वाधिक साक्षरता दर (केन्द्र प्रशासित): लक्षद्वीप (92%)
इन आँकडो पर नजर डालें तो हम पाते है कि आज भी हम विश्व साक्षरता प्रतिशत से 14% पीछे चल रहे है।
भारतीय शिक्षा की प्रमुख समस्या अनिवार्य एंव प्राथमिक शिक्षा की समस्या है। भारत में साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है, इसलिए प्राथमिक शिक्षा की प्रगति अभी उपेक्षित नहीं हुयी है। साथ ही राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं भौगोलिक कारण भी प्राथमिक शिक्षा की प्रगति में बाधक है । शिक्षा का मूल कारण संविधान की अवहेलना भी है, संविधान की धारा 45 मे वर्णित नियम के अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की निःशुल्क शिक्षा व्यावस्था करना राज्य सरकारो का कर्तव्य है, किन्तु सभी राज्यों ने इसकी प्रतिपूर्ती करने में उदासीउन रवैय्या अपना रखा है। सरकारी योजनाएँ सिर्फ सरकारी बाबूओ के दफ्तर में कागजों पर लागू होकर रह जाती है, एवं युवाओं को नौकरिया भी कागजों पर ही उपलब्ध करवायी जा रही है। सरकारी आँकडों पर नजर डाले तो आज देश मे कोई युवा बेरोजगारों की  श्रेणी मे नही आता है। इसके परिणाम स्वरुप उच्च शिक्षा लेने के पश्चात भी बेरोजगारी विघमान है उच्च शिक्षा लोगो को रोजी-रोटी देने में असमर्थ रही है।

आज शिक्षा में राजनिती हावी है शिक्षा का खुलेआम बाजरीकरण करके युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है कालाबाजारी चरम पर है सरकारी की उदासीनता के पीछे का कारण है सत्ता के पीछे बैठे मंत्रियों अफसरों का मलाई खाना इनके रहनुमा सरकार के नाक के नीचे चने की की खेती कर रहे है, और इन्को साँप सूंघ गया है। शिक्षा का बाजारीकरण एवं राजनीतीकरण बन्द होना चाहिए युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड करना बन्द करो।
आज़ादी के समय भारत की साक्षरता दर मात्र  (12%) प्रतिशत थी जो बढ़ कर लगभग (74%) प्रतिशत हो गयी है| परन्तु अब भी भारत संसार के सामान्य दर (85%) से बहुत पीछे है| भारत में संसार की सबसे अधिक अनपढ़ जनसंख्या निवास करती है, आँकडों से अनुमान लग जाता है कि आज भी हम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे है और भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली कैसी है।