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Friday, 4 August 2017

फ़ेसबुक से तबाह होती मासूम जिन्दगी





सलोनी ने आज कई दिनों के बाद फेसबुक खोला था। एग्जाम के कारण उसने अपने स्मार्ट फोन से दूरी बना ली थी। फेसबुक ओपन हुआ तो उसने देखा की 35-40 फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग पड़ी थीं, उसने एक सरसरी निगाह से सबको देखना शुरू कर दिया। तभी उसकी नज़र एक लड़के की रिक्वेस्ट पर ठहर गई, उसका नाम राज शर्मा था, बला का स्मार्ट और हैंडसम दिख रहा था।
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अपनी डी.पी. में सलोनी ने जिज्ञासावश उसके बारे मे पता करने के लिये उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी तो वहाँ पर उसने एक से बढ़कर एक रोमान्टिक शेरो शायरी और कवितायेँ पोस्ट की हुई थीं, उन्हें पढ़कर वो इम्प्रेस हुए बिना नहीं रह पाई, और फिर उसने राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्टकर ली। अभी उसे राज की रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किये हुए कुछ ही देर हुई होगी की उसके मैसेंजर का नोटिफिकेशन के साथ बज उठा। उसने चेक करा तो वो राज का मैसेज था, उसने उसे खोल कर देखा तो उसमें राज ने लिखा था " थैंक यू वैरी मच "।

वो समझ तो गई थी की वो क्यों थैंक्स कह रहा है फिर भी उससे मज़े लेने के लिये उसने रिप्लाई करा "थैंक्स किसलिये ?"
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उधर से तुरंत जवाब आया " मेरी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के लिये "।

सलोनी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक स्माइली वाला स्टीकर पोस्ट कर दिया और फिर मैसेंजर बंद कर दिया, वो नहीं चाहती थी की एक ही दिन मे किसी अनजान से ज्यादा खुल जाये और फिर वो घर के कामों मे व्यस्त हो गयी।
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अगले दिन उसने अपना फेसबुक खोला तो उसे राज के मैसेज नज़र आये, राज ने उसे कई रोमान्टिक कवितायेँ भेज रखीं थीं। उन्हें पढ़ कर उसे बड़ा अच्छा लगा, उसने जवाब मे फिर से स्माइली वाला स्टीकर सेंड कर दिया। थोड़ी देर मे ही राज का रिप्लाई आ गया। वो उससे उसके उसकी होबिज़ के बारे मे पूँछ रहा था। उसने राज को अपना संछिप्त परिचय दे दिया। उसका परिचय जानने के बाद राज ने भी उसे अपने बारे मे बताया कि वो एम बी ए कर रहा है और जल्दी ही उसकी जॉब लग जायेगी। और फिर इस तरह से दोनों के बीच चैटिंग का सिलसिला चल निकला।

सलोनी की राज से दोस्ती हुए अब तक डेढ़ महीना हो चुका था। सलोनी को अब उसके मेसेज का इंतज़ार रहने लगा था। जिस दिन उसकी राज से बात नहीं हो पाती थी तो उसे लगता जैसे कुछ अधूरापन सा है। राज उसकी ज़िन्दगी की आदत बनता जा रहा था। आज रात फिर सलोनी राज से चैटिंग कर रही थी, इधर-उधर की बात होने के बाद राज ने सलोनी से कहा ... "यार हम कब तक यूंहीं सिर्फ फेसबुक पर बाते करते रहेंगे, यार मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ, प्लीज कल मिलने का प्रोग्राम बनाओ ना "।
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सलोनी खुद भी उससे मिलना चाहती थी और एक तरह से उसने उसके दिल की ही बात कह दी थी लेकिन पता नहीं क्यों वो उससे मिलने से डर रही थी, शायद अंजान होने का डर था वो। सलोनी ने यही बात राज से कह दी," अरे यार इसीलिये तो कह रहा हूँ की हमें मिलना चाहिये, जब हम मिलेंगे तभी तो एक दूसरे को जानेंगे "।

राज ने उसे समझाते हुए मिलने की जिद्द की," अच्छा ठीक है बोलो कहाँ मिलना है, लेकिन मैं  ज्यादा देर नहीं रुकुंगी वहाँ " सलोनी ने बड़ी मुश्किल से उसे हाँ की," ठीक है तुम जितनी देर रुकना चाहो रुक जाना " राज ने अपनी खुशी छिपाते हुए उसे कहा, और फिर वो सलोनी को उस जगह के बारे मे बताने लगा जहाँ उसे आना था।

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अगले दिन शाम को 6 बजे, शहर के कोने मे एक सुनसान जगह पर एक पार्क, जहाँ पर सिर्फ प्रेमी जोड़े ही जाना पसंद करते थे, शायद एकांत के कारण, राज ने सलोनी को वहीँ पर बुलाया था, थोड़ी देर बाद ही सलोनी वहाँ पहुँच गई, राज उसे पार्क के बाहर गेट के पास अपनी कार से पीठ लगा के खड़ा हुआ नज़र आ गया, पहली बार उसे सामने देख कर वो उसे बस देखती ही रह गई, वो अपनी फोटोज़ से ज्यादा स्मार्ट और हैंडसम था।
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सलोनी को अपनी तरफ देखता हुआ देखकर उसने उसे अपने पास आने का इशारा करा, उसके इशारे को समझकर वो उसके पास आ गई और मुस्कुरा कर बोली " हाँ अब बोलो मुझे यहाँ किसलिये बुलाया है "



"अरे यार क्या सारी बात यहीं सड़क पर खड़ी-2 करोगी, आओ कार मे बैठ कर बात करते हैं "
और फिर राज ने उसे कार मे बैठने का इशारा करके कार का पिछला गेट खोल दिया, उसकी बात सुनकर सलोनी मुस्कुराते हुए कार मे बैठने के लिये बढ़ी, जैसे ही उसने कार मे बैठने के लिये अपना पैर अंदर रखा तो उसे वहाँ पर पहले से ही एक आदमी बैठा हुआ नज़र आया। शक्ल से वो आदमी कहीँ से भी शरीफ नज़र नहीं आ रहा था। सलोनी के बढ़ते कदम ठिठक गये, वो पलट कर राज से पूँछने ही जा रही थी की ये कौन है कि तभी उस आदमी ने उसका हाँथ पकड़ कर अंदर खींच लिया और बाहर से राज ने उसे अंदरधक्का दे दिया। ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ की वो संभल भी नहीं पाई, और फिर अंदर बैठे आदमी ने उसका मुँह कसकर दबा लिया ताकि वो चीख ना पाये और उसके हाँथों को राज ने पकड़ लिया। 
अब वो ना तो हिल सकती थी और ना ही चिल्ला सकती थी। और तभी कार से दूर खड़ा एक आदमी कार मे आ के ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और कार स्टार्ट करके तेज़ी से आगे बढ़ा दी।और पीछे बैठा आदमी जिसने सलोनी का मुँह दबा रखा था वो हँसते हुए राज से बोला....."वाह असलम भाई वाह.....मज़ा आ गया..आज तो तुमने तगड़े माल पर हाँथ साफ़ करा है... शबनम बानो इसकी मोटी कीमत देगी "

उसकी बात सुनकर असलम उर्फ़ राज मुँह ऊपर उठा कर ठहाके लगा के हँसा, उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई भेड़िया अपने पँजे मे शिकार को दबोच के हँस रहा हो। और वो कार तेज़ी से शहर के बदनाम इलाके जिस्म की मंडी की तरफ दौड़ी जा रही थी।
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‌ ये कोई कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है छत्तीसगढ़ की सलोनी। जो मुम्बई से छुड़ाई गई है। ये सलोनी की कहानी उन लड़कियो को सबक देती है जो सोशल मीडिया से अनजान लोगो से दोस्ती कर लेती है और अपनी जिंदगी गवां लेती है ।
शेयर जरूर करे ताकि कोई और सलोनी ऐसी दलदल में ना फंस जाए।

‌ इस सबके जिम्मेदार आप लोगो में से ही है। जो पोस्ट पढ़ के कमेंट कर रहे है लेकिन पोस्ट को शेयर नही कर सकते। शेयर करेंगे तो ज्यादा लोगो तक पोस्ट जायेगा ज्यादा लड़कियों को पता चलेगा और वो सावधान होंगी


साभार-:

आरोही चौधरी के फ़ेसबुक वाल से
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Thursday, 6 July 2017

विधवा के लिए देवदूत बनी यह आईएएस किंजल सिंह




गर्दिश से दो चार फुटपाथ पर सब्जी बेंचकर जीवन के तल्ख दौर से गुजर रही बेवा मोना की जिन्दगी में जिलाधिकारी किंजल सिंह उजास बनकर देवदूत की तरह शामिल र्हुइं। सराय पोख्ता मस्जिद की व्यवस्था देखने के लिए अचानक चौक सब्जी मण्डी में पहुची किंजल सिंह को जर्जर हालत की वृद्धा मूना पर नजर पड़ी जो सब्जी बेंच रही थी। मूना के पास किंजल सिंह पहुंची और करैले का भाव पूंछा एक किलो करैला लिया जिसकी कीमत 50 रूपये थी परन्तु उसके एवज में मूना को उहोंने 1550 रूपये दिये और घर का अता-पता हाल-चाल पूंछकर चली गयीं।
यह वाकया सोमवार संध्याकाल करीब 7 से 8 के मध्य का है।
जिलाधिकारी करैला खरीदकर चली गयीं और 1550 रूपये पाकर बेवा मूना सुनहरे ख्वाब बनते हुए ककरही बाजार स्थित अपने टीनशेड के घर जा पहुंचीं और अपनी 17 वर्षीय नातिन रीतू पुत्री राम सुरेश मूल निवासिनी कन्हई का पुरवा हांसपुर जो अपनी नानी की देखरेख के अलावां परमहंस डिग्री कालेज अयोध्या में बीए प्रथम वर्ष में अध्ययन कर रही है को सारा वाकया बताया। खाना पका बेना झलते हुए नानी नातिन सोने की तैयारी करने लगीं रात्रि के लगभग 11 बजे थे तभी कई गाड़ियां बेवा मूना के घर के सामने आ रूकीं इन गाड़ियों में चिकित्सकों की भी एक टीम थी जिलाधिकारी किंजल सिंह व सरकारी अमला मूना के घर पहुंचा वहां की दशा देख उनका दिल पसीज गया
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जिलाधिकारी किंजल सिंह ने मौके पर मौजूद जिलापूर्ति अधिकारी दीपक शरण वार्ष्णेय को निर्देशित किया कि तत्काल मूना को 5 किलो अरहर की दाल, 20 किलो आंटा, 50 किलो गेहूं और 40 किलो चावल उपलब्ध कराओ जबतक राशन आ नहीं जाता मैं यहीं रहूंगी। किंजल सिंह का फरमान सुन डीएफओ के फाक्ते उड़ गये कोटेदारों की दूकाने रात में बन्द हो चुकी थीं डीएसओ के एक शुभचिन्तक ने सलाह दिया कि कंधारी बाजार का कोटेदार राकेश गुप्ता की बहुत बड़ी राशन की दूकान है उसी से सारे सामान मंगवा लें। डीएसओ साहब गाड़ी पर सवार होकर कोटेदार राकेश की दूकान पर पहंुचे इतना सामान राकेश देने में जब असमर्थता जताने लगे तो पड़ोस के कोटदार आनन्द गुप्ता को भी तलब कर लिया गया। दोनो कोटेदारों ने डीएम की मंशा के अनुरूप राशन डीएसओ की गाड़ी में भरवाया और डीएमओ उसे लेजाकर मूना के हवाले कर दिया तबतक रात्रि के 12 बज चुके थे और डीएम साहिबा मौके पर थीं।
डीएम किंजल सिंह की उदारता यहीं थमी नहीं उन्होंने एसडीएम दीपा अग्रवाल को निर्देशित किया कि सुबह होते ही मूना को एक टेबल फैन, उज्जवला योजना के तहत एलपीजी सिलेंडर मय चूल्हा, तख्त, दो साड़ी और चप्पल उपलब्ध करा दिया जाय। एडीएम व एसडीएम ने मिलकर यह मांग मंगलवार की सुबह ही पूरा कर दिया। जाते -जाते 75 वर्षीय मूना से वादा कर गयीं कि खाना पकाने का वर्तन, पानी पीने के लिए एक हैण्डपम्प और रहने के लिए आवास का निर्माण सरकारी खर्चे से कराया जायेगा। डीएम की इस उदारता से जहां बेवा मूना व नातिन रीतू फूली नहीं समा रही हैं वहीं शहर के नुक्कड़ चौराहों के टी स्टालों पर डीएम की उदारता की चर्चाएं आम हो गयी हैं।

Friday, 23 June 2017

एक आधिकारी ऐसा भी जिससे ख़ौफ खाता था पाकिस्तान!



कुलभूषण जाधव के साथ पाकिस्तान ने जो कुछ किया है उसके बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि हम उसे उसकी ही भाषा में जवाब क्यों नहीं देते हैं? बहुत कम लोग इस सच से परिचित है कि इस देश में एक ऐसा अधिकारी था जिसने उसे उसकी समझ में आने वाली भाषा में ही जवाब दिया था और वह अंदर तक हिल उठा था। अगर उस अधिकारी की बात मान ली गई होती तो पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांत बांग्लादेश की तरह ही अलग देश बन गए होते। मगर उसकी सलाह की अनदेखी की गई।

इस अफसर का नाम गिरीश चंद्र सक्सेना था जिन्हें गैरी के नाम से जाना जाता था। वे रिसर्च एंड एनलिसिस विंग रॉ के प्रमुख रहे। उनके ही कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और जम्मू कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने वहां के प्रथकतावादियों से निपटने में बहुत होशियारी से काम लिया। हाल ही में लंबी बीमारी के बाद 90 साल की आयु में उनका निधन हुआ।

जब देश आजाद हुआ तो इंटेलीजेंस जुटाने की जिम्मेदारी इंटलीजेंस ब्यूरो की होती थी। उसकी एक घरेलू व दूसरी विदेशी विंग हुआ करती थी मगर 1962 के चीन के साथ युद्ध में तथा 1965 के पाक युद्ध में खुफिया जानकारी हासिल करने की विफलता उभर कर सामने आई। इंदिरा गांधी चाहती थी कि अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआईए की तर्ज पर हम भी ऐसी एजेंसी तैयार करे जो देश के बाहर भी भारत के हितो का ध्यान रख सके।


उन्होंने इसके लिए रिसर्च एंड एनलिसिस विंग बनाने का फैसला किया व इंटेलिजेंस ब्यूरो के बहु-चर्चित रामेश्वर नाथ काव की अध्यक्षता में इस एजेंसी का गठन हुआ। 21 सितंबर 1968 में मात्र दो करोड़ रुपए के बजट व आईबी से लाए गए 250 अफसरो, कर्मचारियो के स्टाफ से इस एजेंसी ने अपना काम-काज शुरू किया। अगले ही साल गिरिश चंद्र सक्सेना भी रॉ में आ गए। रॉ के जिन अधिकारियों ने बांग्लादेश की आजादी के लिए रणनीति बनाई। उनमें से एक प्रमुख अधिकारी गैरी सक्सेना भी थे। इन लोगों ने वहां के बारे में खुफिया जानकारियां उपलब्ध कराई व सेना ने मुक्ति वाहिनी को प्रशक्षित कर सेना, नौसेना व वायुसेना के सफल ऑपरेशन कर पाने में मदद की।

बांग्लादेश बनवाने के बाद 1975 में बहुत ही सफलतापूर्वक सिक्किम को भारत का 22वां राज्य बनवाने में रॉ ने अहम भूमिका अदा की। वहां के शासक चोग्याल का झुकाव चीन की और बढ़ रहा था। चीन उसे अपने साथ मिलाना चाहता था मगर इसके पहले ही भारत ने कार्रवाई कर दी। रॉ ने विदेशों में भी अपनी गतिविधियां बढ़ाई। इस बीच केंद्र में सत्ता परिवर्तन हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई रॉ के काफी खिलाफ थे। उनको लगता था कि यह एजेंसी इंदिरा गांधी के लिए काम करती थी और वे उसका इस्तेमाल अपने विरोधियों को निपटाने के लिए कर रही थी।

मालूम हो कि कैबिनेट सचिवालय के तहत आने वाली रॉ सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करती थी। उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नहीं हुआ करते थे। रॉ के प्रमुख को सेक्रेटरी (रिसर्च) नाम से जाना जाता था। जनता सरकार ने यह पद बदल कर डायरेक्टर कर दिया जोकि 1986 तक बना रहा। रॉ का असली कार्यक्षेत्र तब पाकिस्तान हुआ करता था। वह यह पता लगा रही थी कि क्या पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम चल रहा है? रॉ ने काठुआ स्थित परमाणु प्रयोगशाला के आसपास जो अपने जासूस नियुक्त किए थे उन्होंने वहां काम करने वाले कर्मचारियों और अफसरों पर नजर रखी। जब वे लोग अपने बाल कटवाने जाते तो ये लोग नाई की दुकान से बाल एकत्र करके भारत भेजते। जहां जांच में उनके बालों में रेडियो सक्रियता के संकेत मिले।

समय रहते भारत उस प्रयोगशाला को नष्ट कर सकता था। मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की एक भूल (बेवकूफी) ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेरने के साथ ही बड़ी तादाद में भारतीय एजेंटों को मरवा दिया। एक बार प्रधानमंत्री जुल्फीफार अली भुट्टो से बातचीत में उन्होंने कहा कि हमे सब पता है कि काठुआ में क्या हो रहा है। कहते है इसके बाद पाकिस्तान सावधान हो गया। वहां की सुरक्षा बढ़ा दी गई व करीब 150 भारतीय एजेंटो को मार दिया गया।

गैरी सक्सेना 1983 में रॉ के प्रमुख बने व 1986 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल के दौरान ही ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल को बहुत अहम जिम्मेदारी सौपी। वे पाकिस्तानी एजेंट बनकर स्वर्ण मंदिर परिसर में रहने लगे और वहां से तमाम अहम सूचनाएं रॉ को देने लगे।

गैरी सक्सेना के कार्यकाल में रॉ ने बड़ी तादाद में आईएसआई के एजेंटो को तोड़कर उन्हें डबल एजेंट बनाया और पाकिस्तानन को उसकी ही भाषा में जवाब देने के लिए बलूचिस्तान व सिंध में आंदोलन खड़े किए। मोहाजिर कौमी मूवमेंट खड़ा करने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही। वे चाहते थे कि सिंध को भी बांग्लादेश की तरह पाकिस्तान से अलग कर दिया जाए। मगर इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं थी। सीआईए से जुड़ी फैडरेशन ऑफ अमेरिकन साईटिस्ट नामक संस्था के मुताबिक 1983 में पाकिस्तान के अंदर 35000 रॉ के एजेंट काम कर रहे थे। इनमें से 12000 सिंध में 5000 ब्लूचिस्तान में थे। एमक्यूएम के नेता अलताफ हुसैन को पनपाने में उनकी अहम भूमिका रही। वहां रॉ ने उन्हीं कारनामों को अंजाम दिया जो कि आईएसआई भारत में देती आई थी। उन्होंने पाकिस्तान व खालिस्तान आतंकवादियों से निपटने के लिए रॉ के अंदर दो खास प्रकोष्ठ बनाए जिन्हें कि सीआईटी (एम्स) काउंटर इंटेलिजेंस पाकिस्तान व सीआईटी (जे) काउंटर इंटेलिजेस खालिस्तान के नाम से जाना जाता था। पीवी नरसिंहराव के वक्त ये काम काफी बढा। जब इंदर कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने और सीमा पर मोमबत्तियां जलाने का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने पाक से संबंध बेहतर बनाने के लिए इन दोनों ही प्रकोष्ठो को बंद करवा दिया।

यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था। रॉ की सारी मेहनत बर्बाद हो गई और उसने वहां जो अपना विशेष तंत्र तैयार किया था वह बेकार हो गया। रॉ ने कुछ खास कार्रवाईयों को अंजाम देने के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट सनरे के तहत विशिष्ट कमांडों टुकड़ी तैयार की जिसे स्पेशल ग्रुप के नाम से जाना जाता था। इसमें सेना के 250 चुनिंदा कमांड़ों को रखा गया था। जो अमेरिकी सील की तरह किसी भी देश की सीमा में घुसकर कहीं भी कोई कार्रवाई कर सकते थे।

इस मामले में ध्यान रहे कि जब इंदिरा गांधी की हत्या हो गई तो यह सवाल पैदा हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सुरक्षा का काम कौन करेगा? सेना यह काम कर नही सकती थी व तब एनएसजी का गठन नहीं हुआ था। उस समय उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी एसजी को सौंपी गई। इसके दाढ़ी वाले कमांडों अपनी काली पोशाक में काफी डरावने लगते थे। वे हमेशा चुप रहते थे। आपस में भी कोई बात नहीं करते थे। उनकी आंखें सामने वाले को भेदती हुई लगती थी। वे 1986 तक एसपीजी का गठन होने तक उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाले रहे।

गैरी सक्सेना ने राजीव गांधी के सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभाई थी। वे दो बार जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए। पहली बार उन्हें 1990 में जगमोहन को हटाकर भेजा गया। जब मीरवाइज की हत्या के बाद वहां काफी खून-खराबा हुआ था व दोबारा वे 2 मई 1998 से 4 जून 2003 तक राज्यपाल बनाए गए। उस दौरान कांधार कांड हो गया और विमान अपहरणकर्ताओं ने तीन कुख्यात आतंकवादियों की रिहाई की मांग की जिनमें से दो कश्मीर की जेल में बंद थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला इसके लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने अजीत डोभाल से साफ मना कर दिया।

कहते है कि डोभाल ने राजभवन जाकर सारी बात गैरी सक्सेना को बताई। उन्होंने मुख्यमंत्री को बुलवाया। उनके आने के पहले ब्लैक लेबल स्काच और दो गिलास मंगवाए। फारूक को दो लार्ज पैग बना कर दिए। उससे पहले मुफ्ती की लड़की के कारण आतंकवादियों को छोड़ा गया था और अब दोबारा वहीं गलती की जा रही है। बहरहाल गैरी और फारूक की बात हुई। जैसे ही उनका गिलास खाली हुआ, गैरी ने एक और लार्ज पैग तैयार किया और उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है विमान तैयार है उनकी रिहाई के आदेश जारी कर दो।

लेखक-: विवेक सक्सेना, 

Saturday, 17 June 2017

छोटू को मुस्करानें दो बच्चों को बच्चा ही रहनें दो (say no to child labour in Hindi)



रोज़ सुबह जूठे बर्तन उठाता है छोटू
होटलों पर साहब को कटिंग चाय पिलाता है छोटू
फ़िर भी अपने हाल पर हर वक्त मुस्कराता है छोटू
मैम साहब के बच्चे को बहलाता है छोटू
उन्हे नहला कर स्कूल ले जाता है छोटू
अपनी तकदीर पर फ़िर भी मुस्कराता है छोटू
छोटी-छोटी गलतियों पर साहब से मार खाता है छोटू
फ़िर भी अपनी बेवशी पर मुस्कराता है छोटू
बाजारों मे गुब्बारों को देख खिलखिलाता है छोटू
अपनी जेब में हाथ डाल कर फ़टी जेब पर मायूस हो जाता है छोटू
चाहे धूँप हो चाहे छाँव हो हर दिन ड्यूटी बजाता है छोटू
मुँह में चाहे न निवाले हो पैरों‌ में चाहे छाले हो फ़िर भी काम पर आता है छोटू।।
           Say no to child labour in hindi

यही कुछ दर्द विदारक पंक्तियाँ है, जो हमें लिखने के लिए वेवश कर देती है। बात जब दर्द और अहसास की हो तो कलम और शब्दकोश में संधर्ष होना निश्चित है। ऐसे संधर्ष को चरणबद्ध करने के लिए कलम को भी काफ़ी संधर्ष करना पड़ता है। अहसास कलमों से बयां होने वाली विषयवस्तु नहीं है,अपितु अनतःकरण को झकझोर देने वाली समरेकित अवधारणा है, यह कोई पंक्तियाँ नहीं है न ही किसी कवि के कलाकारी का अनुपम उदाहरण है, यह सत्य है अकाट्य सत्य जो नित्य हमारें समाज मे धटित हो रही है। कहते है युवा देश का भविष्य है, हमारे देश की अर्थव्यवस्था युवाओं‌ के कंधों पर टिकी है लेकिन वो कौन से युवा है जो स्वयं रेलवे स्टेशनों पर बस अड्डों पर हाथ फैलाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है या वह युवा है जो होटलों में फ़ैक्ट्रियों में स्वयं के भविष्य को बचाने के लिए संधर्ष कर रहे है।

राष्ट्र को दीपों की माला से प्रज्जवलित करने वाला "असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय" की परिकल्पना से कोशो दूर एक परिवार का नन्हा दीपक स्वयं अपने धर को हर तमस से बचाने के लिए संधर्ष कर रहा है, वह नन्हा दीपक अपने धर को नहीं तमस से बचा पा रहा है, तो राष्ट्र को क्या खाक प्रज्जवलित करेगा।

रोज़ सुबह ऐसे हजारों छोटूओं को जूठे बर्तन उठाते धुलते देखा है, साहब के लिए कटिंग चाय की प्याली लेकर बड़ी तन्मयता से मुस्कुराता है मानों उसका संसार यही तक सीमित है। उस गरीब का दर्द कौन समझेगा जिसकी साँसे भी गुब्बारों‌ में बिक जाती है, रेलवे स्टेशनों पर बस अड्डों पर देश का दीपक हाथ फ़ैलाये बुझने से बचने के लिए संधर्ष करता हुआ दिख जाता है।
    Say no to child labour in hindi

लेकिन बिड़म्बना देखो अमीरों के छत कितने छोटे और गरीबों‌ का आशियाना कितना बड़ा है पूरा खुला आसमान है जहाँ से हर रोज़ असंख्य तारों को गिनकर अपनी राते बिताता है। सपने देखता है कि इन्ही तारों की तरह वह भी एक दिन राष्ट्र के मानस पर टिमटिमायेगा। गर्मी हो या सर्दी धूप हो या छाँव, ठुरठुराती सर्दी में भी स्ट्रीट लाइटों‌ के प्रकाश में अपने भविब्य की आस लगाये एक नये नूतन उजाले की आशा लेकर बैठा रहता है, शायद उसके जीवन में भी नये दिन की तरह उजाला भर जाये किन्तु यह मात्र कोरी कल्पना है क्योकि छोटू तो आख़िर छोटू है।




पेट भी कितना निर्मम है जिसे भरने के लिए ननिहालों‌ को भीख़ माँगना पड़ता है, हरिद्धार प्रवास के दौरान एक ऐसे ही छोटू से हमारी मुलाकात हो गयी, मैनें उसको पास बुलाया और पूछा बेटा स्कूल क्यो नहीं‌ जाते उसका जवाब था पैसे नहीं है मैनें कहा भीँख माँगने को कौन भेजता है माँ-बाँप वह एकटक हमारी तरफ़ देखने लगा और अनायाश ही उसके आँखो से आश्रृधारा निकल आयी बोला पिता जी नहीं है माँ बीमार रहती है भीख माँगकर जो पैसे मिलते है उससे उन्की दवा लेते है और कुछ खाने को ले जाते है। मैने पूछा पढ़ने का मन है वह बोला हाँ दो में पढ़ता था छोड़ दिया पैसे ही नहीं है, वह बच्चा तो चला गया किन्तु हमारा हद्धय विकीर्ण हो गया अनेकों प्रशनचिन्ह छोड़ गया जो आज भी अनसुलझे रहस्य की तरह मस्तिष्क में टकराहट पैदा करते रहते है। पता नहीं मेरा संधर्ष समाज से है सरकार से या स्वयं अपने आप से।

12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के रुप में मनाया गया अनेकों‌ कार्यक्रम हुए संगोष्ठियाँ हुयी बडे-बड़े विचारकों‌ द्वारा चिंतन मनन किया गया किन्तु यह सिर्फ औपचारिकता मात्र है धरातल से इनका कोई जुड़ाव नहीं है। धड़ियाली आँसू बहाने वाले समाज के वही लोग है जिनके धरों में फ़ैक्ट्रियों मे फार्म हाऊसों में‌ कार्य करने वाले वही नन्हे दीपक है ननिहाल है।
        Say no to child labour in hindi

सरकार ने बाल श्रम‌ को रोकने के लिए अनेकों‌ कानून बनाये है, किन्तु उनका पालन कही नहीं हो रहा है आज़ भी फ़ैक्ट्रियों में १४ वर्ष से कम‌ उम्र के बच्चो को बोझा ढ़ोते हुए देखा जा सकता है। सरकारी नितियाँ सिर्फ़ कागजो तक सीमित है इन्का कितना क्रियन्वय हो रहा है पूरे समाज को स्पष्ट दिखायी दे रहा है। इसका जिम्मेदार प्रशसनिक अमला ही नहीं है न ही सरकार है अपितु समाज के अन्तिम पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति भी है जो देश के ननिहाल रुपी ईटों‌ का सही संयोजन न करके देश को गर्त में ले जाने की धारणा को विकसित करने कार्य सृजित कर रहा है।




मंजिले और भी हैं!
कैलाश सत्यार्थी




मंजिले और भी है में आज आपको मिलवाते है ऐसे महान शख्सियत से जिन्होने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया बाल श्रम से विश्च को मुक्त कराने के लिए



2014 में नोबेल के शान्ति पुरस्कार विजेता भारतीय बाल आधिकार कार्यकर्ता और बाल श्रम के विरुद्ध पक्षधर है जिन्हे पकिस्तान की नारी शिक्षा कार्यकर्ती मलाला युसुफ़ज़ई के साथ संयुक्त रुप से नोबेल शान्ति पुरस्कार से अलंकृत किया ऐसे महान शख्सियत का नाम लेना बड़ा चुनौतीपूर्ण हो रहा है मैं बात कर रहा हूँ कैलाश सत्यार्थी की। जिन्होने १९९० में बचपन बचाओं आन्दोलन की बिगुल बजायी जिसके अंर्तगत १४४ देशों के लगभग ८३००० बच्चों को मुक्त कराया जा चुका है। उनके अथक प्रयास एवं कार्यों के कारण १९९९ में अंर्तराष्ट्रीय श्रम संघ द्वारा बाल श्रम की निकृष्टम श्रेणियों पर संधि संख्या १८२ अंगीकृत किया गया। कैलाश सत्यार्थी जी ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ट लेबर (global march against child labour) के अध्यक्ष (president) भी है। उन्होंने अपनी आवाज़ को जन-जन तक पहुचाँने के लिए संधर्ष जारी रहेगा नामक पत्रिका का शुरुआत की। स्वामी अग्निवेश जी के साथ मिलकर बंधुआ मुक्ति मोर्चा का गठन किया जिसकें आज़ २० हजार सदस्य है, जो कालीन, काँच, ईट के भठ्ठों, फै़क्ट्रियो में कार्य करने वाले बच्चो को‌ मुक्त करता है। आज़ हमारे समाज़ को ऐसे ही शख्सियत की अवश्यकता है जो युगों-युगों में विरले ही होते है। आज से मिलकर आओं संकल्प लेते है ज़्यादा नहीं सिर्फ समाज के एक ईट के क्रम का संयोजन करेंगे। हम समाज को में परिवर्तन नहीं‌ ला सकते है किन्तु अपने स्तर से शुरुआत तो कर ही सकते है।



हम बदलेंगे-युग बदलेगा


मंजिले और भी हैं!
जितेन्द्र चतुवर्वेदी




मंजिले और भी है में ऐसी ही एक और शख्सियत से मिलवाता हूँ मैं बात कर रहा हूँ जितेन्द्र चतुर्वेदी जी की अनेकों राष्ट्रीय, अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से अलकृत एवं बाल श्रम के ख़िलाफ अनेकों‌आन्दोलन चलाने वाले शख्सियत के बारे में है जो बाल-विकास एवं स्वास्थय संवर्धन के पक्षधर है जितेन्द्र चतुर्वेदी जी राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) बिट्स पीलानी के मेंटर (Menter) एवं देहात संस्था के संस्थापक है। 

देहात संस्था द्वारा रुपैड़ीहा में हस्ताक्षर अभियान





देहात संस्था ने बाल श्रम के विरुद्ध १२ जून को नेपाल-भारत सीमा पर स्थित रुपैड़ीहा में बाल श्रम विरोध दिवस के रुप में हस्ताक्षर अभियान चलाया। बाल प्रहरी परियोजना के अंतर्गत बाल संसदीय मासिक बैठक कर उन बच्चों के दिये में उजाला करने का कार्य किया है जिनका नाम विधालयों में दर्ज था किन्तु कभी विधालयों की दहलीज पर पग नहीं रखे थे। तथा चाइल्ड़ लेवर के अगेन्सट (Against child labour) नेपाल-भारत सीमा स्थित रुपैड़ीहा में बाल मित्र केन्द्र की स्थापना की। मैं श्रीमान जी से व्यक्तिगत तौर पर नहीं मिला हूँ किन्तु थोड़ी जान पहचान अवश्य हुयी थी। ऐसे महान व्यक्तित्व को हद्धय के न्यून्तम बिन्दु से नमन् आपके पगचिन्हों पर चलने के लिए कृतज्ञ हूँ।
आओं सभी मिलकर समाज में परिवर्तन लाने का संकल्प धारण करते है-हम बदलेंगे, युग बदलेगा।। मैंने व्यक्तिगत तौर पर यह जानकारी एकत्र नहीं की है श्रीमान् जी के फ़ेसबुक वाल से साभार। (Facebook wall)

 
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